एबीएन सोशल डेस्क। सनातन धर्म में यात्राओं का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। यात्रा की परंपरा बुद्ध के साथ शुरू हुई। उन्होंने सबसे पहले बोधगया से सारनाथ की यात्रा की। फिर जगह-जगह गये। क्योंकि उन्हें अपने विचार रखने थे। अपना ज्ञान बांटना था।
फिर आदिगुरु शंकराचार्य ने एक यात्रा की। अखंड भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली यात्रा। चार दिशाओं में चार धाम स्थापित किये। मिथिला में शास्त्रार्थ किया। बौद्ध विहारों में पड़े आलसी भिक्षुओं को कर्त्तव्य पथ पर लाने के लिए गांव-गांव गये और हिंदुत्व की पुनर्स्थापना की।
उसके बाद सीधे हम आते हैं गांधी जी की दांडी यात्रा से। इसका उद्देश्य था अंग्रेजों के खिलाफ जन जागरण। फिर आजादी के बाद आये विनोबा भावे। उन्होंने जमींदारों से जमीन लेकर गरीबों में बांटने के लिए भूदान यज्ञ शुरू किया। इसके लिए भी वे जगह- जगह गये।
फिर आया जयप्रकाश आंदोलन। इसमें भी गुजरात से शुरू हुई नव निर्माण यात्रा बिहार आते-आते जन आंदोलन बन चुका था। इसी कड़ी की अंतिम यात्रा थी आडवाणी की रथयात्रा। जयप्रकाश आंदोलन और रथयात्रा दोनों का निहितार्थ सत्ता परिवर्तन था और सफल भी रहीं।
यह यात्राएं स्वत: स्फूर्त थीं। लोग जुड़ते गये कारवां बनता गया।
यात्री गांव में रुकते थे, वहीं भाषण होते थे। जो मिला खा लिया, जहां रात हुई सो गये।
इसी कड़ी में नागरकोइल तमिलनाडु से शुरू हुई राहुल गांधी की यात्रा हाईटेक यात्रा है। एसी कंटेनर हैं। बेड है। किचन है। बाथरूम है। सारी सुविधाएं हैं। वैसे नागरकोइल के ही कामराज थे, जिन्होंने डूबते कांग्रेस को बचाने के लिए उम्रदराज कांग्रेसियों के रिटायरमेंट का एक कार्यक्रम चलाया था, जिसे कामराज प्लान कहा जाता है। अभी राहुल गांधी केरल से सांसद हैं। राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस के चारों दिग्गज नेता दक्षिण से हैं, शशि थरूर, मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश, वी श्रीनिवास। इसीलिए यात्रा की शुरुआत दक्षिण से हुई है; क्योंकि शुरू- शुरू में भीड़ इकट्ठा करना जरूरी है। अभी तक भारत की परिभाषा कश्मीर से कन्याकुमारी तक थी मगर कांग्रेस ने उल्टा कर दिया।
यह राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की यात्रा है। यह ईडी से बचाने की यात्रा है। उधर, नीतीश कुमार की यात्रा पूरी हो चुकी है। झामुमो नेता रायपुर यात्रा से लौट चुके हैं। केजरीवाल ने भी हरियाणा से अपनी यात्रा शुरू कर दी है। मगर ये यात्राएं न धार्मिक हैं, न राजनैतिक ना सामाजिक। यह यात्राएं खुद को जीवित रखने की, प्रासंगिक बनाये रखने की कवायद भर है। (साभार : झारखण्ड सरकार से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी निरन्तर नारायण के फेसबुक वॉल से)