एबीएन सोशल डेस्क। गुरुपूर्णिमा आध्यात्मिक माहात्म्य बोध पर प्रकाश डालते हुए यज्ञाचार्य लक्ष्मण मंडल ने बताया कि गुरु-पूर्णिमा एक महान अनुशासन पर्व भी है। गुरु-पर्व शिष्य के लिए अपनी श्रद्धा, निष्ठा, तपस्चर्या व साधना द्वारा सशक्त सृजन का प्रयास जारी रखना चाहिए,यही अवसर लेकर पर्व आता है।
गायत्री शक्तिपीठ सेक्टर टू धूर्वा में मंडल जी ने आगे गुरु शिष्य की संबन्धों व शिक्षा दीक्षा, अनुशासनपूर्ण जीवनचर्या पर प्रकाश डाल कहा कि यह पर्व गुरु-शिष्य दोनों वर्गों के लिए अनुशासन का सन्देश लेकर आता है, इसलिए यह अनुशासन पर्व कहा जाता है। अनुशासन मानने वाला ही शासन करता है, यह तथ्य समझे बिना राष्ट्रीय या आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं है।
गुरु पूर्णिमा पर व्यास पूजन का भी क्रम है। जो स्वयं चरित्रवान् हैं और वाणी एवं लेखनी से प्रेरणा संचार करने की कला भी जानते हैं, ऐसे आदर्शनिष्ठ विद्वान् को व्यास की संज्ञा दी जाती है। इसलिए गुरु-पूजा को व्यास पूजा भी कहते हैं। महर्षि व्यास अपने आप में महान् परम्परा के प्रतीक हैं। आदर्श के लिए समर्पित प्रतिभा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। बताया कि सामान्यरूप से भी सिखाने वाले गुरुजनों का अनुशासन स्वीकार किये बिना कुशलता में निखार नहीं आ सकता।
जहाँ यह आवश्यक है कि गुरुजनों को अपना क्रम ऐसा बनाकर रखना चाहिए कि शिष्य वर्ग में उनके प्रति सहज श्रद्धा-सम्मान का भाव जागे, वहाँ यह भी आवश्यक है कि सीखने वाले, शिष्य भाव रखें और गुरुजनों का सम्मान और अनुशासन बनाये रखें।आगे सोदाहरण प्रस्तुत कर बताया कि द्रोणाचार्य कौरवों के सामान्य वेतनभोगी शिक्षक से अधिक कुछ नहीं बन सके ,किन्तु पाण्डवों के लिए अजेय विद्या के स्रोत बने और एकलव्य के लिए एक अद्भुत चमत्कार बन गये।
रामकृष्ण परमहंस भी जन सामान्य को एक बाबा जी से अधिक लाभ न दे सके, किन्तु जिन ने अपनी श्रद्धापूर्ण भक्ति से गुरु रूप में विकसित कर लिया,उसके लिए अवतार तुल्य सिद्ध हुए। अतः गुरुपर्व शिष्य के लिए अपनी श्रद्धा, निष्ठा, तपस्चर्या, साधना द्वारा सशक्त सृजन का प्रयास जारी रखना चाहिए, यही अवसर लेकर आता है।
इस वर्ष में साधक-शिष्यों की संख्या
वृद्धि तथा जन्मदिवस संस्कार, विवाह दिवस संस्कारोत्सव सहित अनेकानेक संस्कार शिक्षण ग्रहण में उत्तरोत्तर वृद्धि को भांपते हुए गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर शक्तिपीठ सेक्टर टू में परिवार जनों, साधक-शिष्यों समूहों की उपस्थिति में सुविधानुसार यज्ञ आहुति प्रदान करने वास्ते 24 कुण्डीय महायज्ञ आयोजन की व्यवस्था की गई।इस अवसर पर कई संस्कार प्रकरण संपन्न किये गये।
शान्तिकुञ्ज की ओर से तथा गायत्री परिवार संगठन समन्वय समिति प्रभारियों की ओर से जेएनपी समन्वयक ने गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक
बधाई संदेश सुनाया।साथ-साथ जेएनपी ने बुद्ध-पूर्णिमा से गुरु-पूर्णिमा तक एक हजार नये गृहे गृहे हुए यज्ञीय अनुष्ठानों ,जागिए जगाइए, जुड़िए जोड़िए, नयी नीति- रीति आधार पर,कुछ प्रखंड स्तर में हुए नवगठन समिति का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर समयदान करने का आवाहन किये।
गुरु-शिष्य के पावन-पुण्य पर्व अवसर पर कई संस्कार भी हुए, जिनमें दो दर्जन गायत्री महामंत्र का दीक्षा संस्कार व यज्ञोपवीत संस्कार, विद्यारम्भ, नामकरण हुए। साथ ही सैकड़ों अस्वस्थ व बीमार जनों के स्वास्थ्य लाभ व परिजनों के सफल सुफल जीवन के लिए गायत्री महामंत्र का जप-अनुष्ठान तथा मंत्र लेखन और उच्चस्तरीय चंद्रायण व्रत-उपवास व मासपारायण अनुष्ठान का संकल्प कराया गया और गायत्री के सहायक 24 मंत्रों की मंगलमय दिव्य आहुतियां सर्वार्थ मंगलमय वातावरण के लिए प्रदान की गयी।
भोजन प्रसाद में अमृताशन की व्यवस्था थी। इसके अतिरिक्त गायत्री शक्तिपीठ अलकापुरी, बस स्टैंड स्थित धूर्वा प्रज्ञापीठ, चेतना केन्द्र टाटीसिलवे और अन्य इकाइयों में यह कार्यक्रम सोल्लास संपन्न हुए। उक्त जानकारी गायत्री परिवार रांची के जय नारायण प्रसाद ने दी।