एबीएन सोशल डेस्क। गंगा देश के पांच राज्यों से होकर बहती है। वह सबसे कम झारखंड में बहती है। लेकिन झारखंड में गंगा पिछले सात साल से प्रदूषण से मुक्त बनी हुई है।
आइये जानते हैं कि झारखंड ऐसा कैसे कर पा रहा है। गंगा की मुख्य धारा का सबसे छोटा हिस्सा झारखंड से होकर गुजरता है। यह हिस्सा लगातार सातवें साल प्रदूषण-मुक्त पाया गया है। यह जानकारी नमामि गंगे से संबंधित रिपोर्ट में दी गयी है।
गंगा बेसिन के पांच राज्यों में झारखंड भी शामिल है। नमामि गंगे के मुताबिक झारखंड में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में साफ किये गये गंदे पानी का इस्तेमाल उद्योगों में किया जा रहा है। इससे नदी को साफ रखने में मदद मिली है। अब इसे गंगा बेसिन के दूसरे राज्यों में भी लागू किये जाने की योजना है।
केंद्र सरकार के इस प्रमुख नदी संरक्षण कार्यक्रम के तहत झारखंड के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए नमामि गंगे ने कहा कि इस राज्य का मॉडल इसलिए अलग है, क्योंकि इसमें दूषित नदी के किसी हिस्से के पुनरुद्धार के बजाय प्रदूषण रोकने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
नमामि गंगे ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट में कहा, जहां अधिकतर नमामि गंगे अभियान की कहानियां सफाई से जुड़ी होती हैं, वहीं झारखंड में नदी को गंदा होने से रोका जाता है। इसमें कहा गया है, वर्ष 2018 में, सीपीसीबी को झारखंड से गुजरने वाली गंगा की मुख्यधारा प्रदूषण-मुक्त मिली थी और नमामि गंगा अभियान के सात साल बाद 2025 में भी, इसमें प्रदूषण नहीं मिला।
राज्य ने इस दिशा में दृढ़ संकल्प दिखाया है। नमामि गंगा के मुताबिक झारखंड में नदी के दूषित हिस्से का पुनरुद्धार करने के बजाय गंगा की मुख्यधारा को स्वच्छ बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। इसके साथ ही सहायक नदियों और औद्योगिक अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम पर कार्य जारी है।
पोस्ट में कहा गया है कि झारखंड में गंगा की स्वच्छता बनाए रखने के लिए 261.5 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) की स्वीकृत शोधन क्षमता वाले पांच मलजल शोधन परियोजनाओं को मंजूरी दी गयी है। ये परियोजनाएं एक हजार 130 करोड़ रुपये की हैं। पोस्ट के मुताबिक इन पांच स्वीकृत परियोजनाओं में से तीन पहले ही पूरी हो चुकी हैं।
स्वीकृत 261.5 एमएलडी शोधन क्षमता में से, गंगा तट के किनारे अब तक 29.5 एमएलडी क्षमता का निर्माण हो चुका है। इसमें 2025-26 में फुसरो मलजल शोधन परियोजना के पूरा होने का उल्लेख किया गया है, जिससे 61.05 करोड़ रुपये की स्वीकृत लागत पर 14 एमएलडी शोधन क्षमता का विस्तार हुआ।
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