महाराष्ट्र का निर्णय एक चेतावनी: क्या झारखंड और बिहार भी मिलावटी भोजन के विरुद्ध निर्णायक कदम उठायेंगे?
शिवाजी क्रांति
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसा अन्न, वैसा मन- भारतीय संस्कृति का यह कथन केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज की आधारशिला है। यदि भोजन ही मिलावटी, भ्रामक और निम्न गुणवत्ता का हो जाये तो उसका दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है।
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। राज्य में एनालॉग (नॉन-डेयरी) पनीर के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर एक वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया। यह निर्णय तब लिया गया जब जांच में ऐसे उत्पादों के उपयोग और गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आयीं।
इस कदम ने पूरे देश में यह संदेश दिया है कि यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाये तो खाद्य मिलावट और उपभोक्ता को भ्रमित करने वाली प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। अब प्रश्न केवल महाराष्ट्र का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या झारखंड और बिहार जैसे राज्य भी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ऐसी ही स्पष्ट और कठोर नीति अपनायेंगे?
आज शहरों से लेकर कस्बों तक भोजन का बड़ा हिस्सा होटल, रेस्टोरेंट, ढाबों, मिठाई दुकानों, बेकरी और आॅनलाइन फूड डिलीवरी के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहा है। उपभोक्ता स्वाद, सुविधा और समय बचाने के लिए इन पर निर्भर हो गया है। लेकिन क्या उसे यह पता है कि उसकी थाली में परोसा गया पनीर वास्तव में दूध से बना है या किसी वनस्पति वसा और रसायनों से तैयार एनालॉग उत्पाद? क्या उसे बताया जाता है कि मिठाई में शुद्ध खोया है या कृत्रिम मिश्रण? क्या मसाले, तेल और घी वास्तव में वही हैं जो उनके नाम से बेचे जा रहे हैं?
दुर्भाग्य से अधिकांश मामलों में उत्तर नहीं है।
छिपे हुए किचन और अदृश्य खतरे
उपभोक्ता किसी होटल या रेस्टोरेंट का सजा-धजा भोजन कक्ष देखता है, लेकिन उसका किचन नहीं देख पाता। अधिकांश रसोईघर आम जनता के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं। भोजन किन परिस्थितियों में तैयार हो रहा है, किस प्रकार का तेल बार-बार उपयोग हो रहा है, कच्चे माल की गुणवत्ता क्या है, सफाई का स्तर कैसा है—इन सबकी जानकारी उपभोक्ता के पास नहीं होती। यही वह जगह है जहां उपभोक्ता और विक्रेता के बीच सबसे बड़ी सूचना-असमानता पैदा होती है। उपभोक्ता विश्वास के आधार पर भोजन खरीदता है, जबकि उसके पास गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच का कोई साधन नहीं होता।
मिलावट केवल धोखा नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट
अक्सर खाद्य मिलावट को केवल आर्थिक अपराध माना जाता है, जबकि इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। घटिया तेल, कृत्रिम रंग, सिंथेटिक दूध, नकली मसाले, मिलावटी घी और निम्न गुणवत्ता के खाद्य पदार्थ अनेक गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इनके कारण पाचन संबंधी रोगों से लेकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं तक का जोखिम बढ़ सकता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब उपभोक्ता को यह भी नहीं बताया जाता कि वह जो पनीर समझकर खा रहा है, वह वास्तव में पारंपरिक डेयरी पनीर नहीं है। यदि किसी उत्पाद का स्वरूप, नाम या प्रस्तुति उपभोक्ता को भ्रमित करती है, तो यह केवल व्यापारिक नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि उपभोक्ता के सूचना के अधिकार का भी उल्लंघन है।
झारखंड और बिहार में स्थिति पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता
झारखंड और बिहार में समय-समय पर दूध, खोया, पनीर, मिठाइयों, सरसों तेल, मसालों तथा अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले सामने आते रहे हैं। त्योहारों के समय प्रशासन द्वारा छापेमारी भी होती है और नमूने लिए जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह कार्रवाई पूरे वर्ष समान गंभीरता से चलती है?
- क्या प्रत्येक जिले में पर्याप्त खाद्य सुरक्षा अधिकारी हैं?
- क्या खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं आधुनिक और पर्याप्त क्षमता वाली हैं?
- क्या दोषियों को समयबद्ध दंड मिलता है?
- क्या उपभोक्ताओं को जांच के परिणाम नियमित रूप से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराये जाते हैं?
- इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर आज भी तलाशे जाने बाकी हैं।
केवल छापेमारी नहीं, व्यवस्था में सुधार चाहिए
खाद्य सुरक्षा केवल त्योहारों के दौरान अभियान चलाने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए स्थायी व्यवस्था विकसित करनी होगी। रेस्टोरेंट और होटल उद्योग में ओपन किचन जैसी अवधारणाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जहां उपभोक्ता भोजन बनने की प्रक्रिया देख सके। जहां यह संभव न हो, वहां नियमित निरीक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वच्छता रेटिंग और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं।
भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी उपभोक्ता के लिए उतनी ही सहज उपलब्ध होनी चाहिए जितनी किसी पैक्ड खाद्य पदार्थ पर सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध होती है।
कानून का भय आवश्यक है
खाद्य मिलावट से होने वाला लाभ यदि दंड से अधिक होगा तो यह अपराध चलता रहेगा। इसलिए केवल जुर्माना पर्याप्त नहीं है। जानबूझकर मिलावट करने, नकली खाद्य पदार्थ बेचने या उपभोक्ता को भ्रमित करने वाले मामलों में कठोर दंड, लाइसेंस निरस्तीकरण और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक है। महाराष्ट्र का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि सरकारें केवल सलाह जारी करने तक सीमित न रहें, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक प्रशासनिक कदम भी उठायें।
केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी
खाद्य सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसमें केंद्र सरकार, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और जिला प्रशासन सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग स्तर की निगरानी होगी तो मिलावटी उत्पाद एक राज्य से दूसरे राज्य में आसानी से पहुंच सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति आवश्यक है। इस रणनीति में आधुनिक प्रयोगशालाओं का विस्तार, त्वरित परीक्षण तकनीक, डिजिटल ट्रेसबिलिटी, नियमित सैंपलिंग, पारदर्शी रिपोर्टिंग और राज्यों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान शामिल होना चाहिए।
सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी आवश्यक
खाद्य सुरक्षा केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। उपभोक्ता संगठन, सामाजिक संस्थाएं, व्यापारी संगठन, शिक्षण संस्थान, चिकित्सक और जागरूक नागरिक भी इस अभियान के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत जैसे संगठन वर्षों से उपभोक्ता जागरण और व्यवस्था सुधार का कार्य कर रहे हैं। यदि सरकार ऐसे संगठनों को विश्वास में लेकर जिला और राज्य स्तर पर संयुक्त जागरूकता अभियान चलाए, शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करे तथा निरीक्षण प्रक्रियाओं में सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित करे, तो इसका सकारात्मक प्रभाव अधिक व्यापक होगा।
उपभोक्ता भी अपनी भूमिका निभायें जागरूक उपभोक्ता ही सबसे बड़ा प्रहरी है। बिना बिल के खरीदारी, संदिग्ध रूप से सस्ते खाद्य पदार्थ, अत्यधिक चमकीले रंग, असामान्य स्वाद या गुणवत्ता पर संदेह होने पर शिकायत दर्ज कराना नागरिक जिम्मेदारी भी है। यदि समाज मिलावट को सामान्य बात मानकर स्वीकार करता रहेगा तो यह समस्या कभी समाप्त नहीं होगी।
समय की मांग
महाराष्ट्र का निर्णय केवल एक राज्य का प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। आज आवश्यकता है कि झारखंड, बिहार सहित सभी राज्य खाद्य सुरक्षा को केवल औपचारिक निरीक्षण का विषय न मानें, बल्कि इसे जनस्वास्थ्य और उपभोक्ता अधिकारों के केंद्र में रखें। हर नागरिक को यह अधिकार है कि उसकी थाली में परोसा गया भोजन शुद्ध, सुरक्षित और सही जानकारी के साथ उपलब्ध हो। भोजन में ईमानदारी केवल व्यापारिक नैतिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, उपभोक्ता अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है।
यदि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन, व्यापारी और जागरूक नागरिक मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर मिलावट मुक्त भारत का अभियान चलायें, तो वह दिन दूर नहीं जब उपभोक्ता भय नहीं, बल्कि विश्वास के साथ भोजन करेगा। अब समय आ गया है कि झारखंड और बिहार भी स्वयं से यह प्रश्न पूछें- क्या हम केवल मिलावट पकड़ने की प्रतीक्षा करेंगे, या महाराष्ट्र की तरह साहसिक निर्णय लेकर अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ठोस कदम उठायेंगे? इस प्रश्न का उत्तर केवल सरकारों को नहीं, पूरे समाज को मिलकर देना होगा। क्योंकि ग्राहक रहेगा मौन तो उसकी सुनेगा कौन? (लेखक शिवाजी क्रांति : अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के क्षेत्रीय बिहार, झारखंड के संगठन मंत्री हैं।)