ऐश्वर्या सिंघानिया
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्- अर्थात शरीर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रथम साधन है। हजारों वर्ष पहले भारत के ऋषि-मुनियों ने इस सत्य को समझा और स्वस्थ शरीर के लिए एक सम्पूर्ण विज्ञान विकसित किया, जिसका नाम है आयुर्वेद। आयुर्वेद दो शब्दों से बना है- आयु: यानी जीवन और वेद यानी ज्ञान। अर्थात आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ है जीवन का विज्ञान। यह केवल रोगों की चिकित्सा नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का शमन करने की समग्र पद्धति है।
आयुर्वेद का इतिहास और मूल सिद्धांत
आयुर्वेद की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय इसके तीन प्रमुख ग्रंथ हैं। महर्षि चरक को चिकित्सा का पितामह और महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। सुश्रुत संहिता में 300 से अधिक शल्य क्रियाओं और 120 शल्य उपकरणों का वर्णन मिलता है, जो दर्शाता है कि 2500 वर्ष पहले भी भारत में सर्जरी कितनी उन्नत थी।
आयुर्वेद का मूल आधार है त्रिदोष सिद्धांत- वात, पित्त और कफ। ये तीनों दोष पंचमहाभूतों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बने हैं। जब ये तीनों दोष संतुलन में रहते हैं, तो शरीर स्वस्थ रहता है। असंतुलन ही रोग का कारण बनता है। आयुर्वेद हर व्यक्ति की प्रकृति को अलग मानता है। किसी की वात प्रकृति है, किसी की पित्त या कफ। इसलिए एक ही रोग की दवा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। यह वैयक्तिक चिकित्सा की अवधारणा आज का आधुनिक विज्ञान भी अपना रहा है।
रोकथाम पर जोर, उपचार पर नहीं
आधुनिक एलोपैथी मुख्यत: रोग होने के बाद उपचार करती है। आयुर्वेद का मूल मंत्र है- स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं। यानी पहले स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करो, फिर रोगी का इलाज करो। इसके लिए आयुर्वेद ने दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार के नियम बताए हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, उषापान, योग, तिल के तेल से अभ्यंग, सात्विक आहार, समय पर सोना- ये सब रसायन की तरह काम करते हैं और रोगों को पास नहीं आने देते।
कोविड के बाद बढ़ी प्रासंगिकता
कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को फिर से प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी का महत्व समझाया। उसी दौर में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा बताये गये काढ़े, हल्दी वाला दूध, गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी जैसे आयुर्वेदिक उपाय घर-घर में अपनाए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी 2022 में गुजरात के जामनगर में ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना की, जो आयुर्वेद की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। आज 2026 में आयुर्वेदिक उत्पादों का वैश्विक बाजार 10 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है।
आधुनिक जीवन में आयुर्वेद की भूमिका
आज की भागदौड़, तनाव, जंक फूड और प्रदूषण ने मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अनिद्रा जैसी लाइफस्टाइल डिजीज को जन्म दिया है। एलोपैथी इनमें लक्षणों को नियंत्रित करती है, पर आयुर्वेद जड़ पर काम करता है। पंचकर्म जैसी शोधन चिकित्सा शरीर से विषाक्त तत्व निकालकर दोषों को संतुलित करती है। शिरोधारा, अभ्यंग, नस्य जैसी क्रियाएं तनाव और माइग्रेन में अत्यंत लाभकारी हैं। त्रिफला, अश्वगंधा, ब्राह्मी, शतावरी जैसे रसायन शरीर और मन दोनों को बल देते हैं।
चुनौतियां और आगे का मार्ग
आयुर्वेद के सामने सबसे बड़ी चुनौती है मानकीकरण और वैज्ञानिक प्रमाण की। हर काढ़ा, हर भस्म एक जैसी गुणवत्ता की हो, इसके लिए आधुनिक शोध, क्लिनिकल ट्रायल और गुणवत्ता नियंत्रण जरूरी है। अच्छी बात है कि आईआईटी, एम्स और सीएसआईआर जैसे संस्थान अब आयुर्वेद पर शोध कर रहे हैं। नयी शिक्षा नीति में भी आयुर्वेद को स्कूली पाठ्यक्रम से जोड़ा जा रहा है ताकि नयी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके।
निष्कर्ष
आयुर्वेद कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि अनुभव और परीक्षण पर आधारित विज्ञान है। यह हमें सिखाता है कि हम प्रकृति का हिस्सा हैं, प्रकृति से अलग नहीं। जब हम प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाते हैं, तो रोग आते हैं। आज जब पूरी दुनिया होलिस्टिक हेल्थ और सस्टेनेबल लिविंग की बात कर रही है, तो आयुर्वेद के पास हर प्रश्न का उत्तर है। आवश्यकता है इसे अंधानुकरण नहीं, बल्कि विवेक और विज्ञान के साथ अपनाने की। जैसा कि चरक संहिता में कहा गया है — धर्मार्थ काम मोक्षाणा मारोग्यं मूलमुत्तमम्। अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल आधार आरोग्य ही है। आइये, आयुर्वेद को अपनाकर हम स्वस्थ भारत, समर्थ भारत के स्वप्न को साकार करें।