अजय सानी
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज के समय में समाज का चेहरा लगातार बदल रहा है। तकनीक, मनोरंजन और आधुनिक जीवनशैली के बीच युवा पीढ़ी की आदतें और सोच भी बदल रही हैं। इन्हीं बदलावों के बीच धूम्रपान और शराब का प्रचलन तेजी से युवाओं के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। यह केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं रह गई है, बल्कि एक प्रकार से सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है। कॉलेज कैंपस, पार्टियों, कॉर्पोरेट जगत, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी धूम्रपान और शराब को एक कूल या स्टाइलिश छवि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इस आभासी आकर्षण के पीछे छिपे खतरों और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
युवा अवस्था जीवन का वह दौर है, जब व्यक्ति अपनी पहचान खोज रहा होता है। इस दौर में मित्रों का प्रभाव, मीडिया का असर और फैशन का दबाव काफी हद तक व्यवहार को प्रभावित करता है। कई युवा केवल सामंजस्य बैठाने के लिए या दूसरों को प्रभावित करने के लिए धूम्रपान और शराब की शुरूआत कर देते हैं। धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है और जीवन भर उनके स्वास्थ्य, करियर और रिश्तों पर असर डालती है। धूम्रपान को अक्सर एक छोटे से शौक की तरह देखा जाता है।
शुरुआत में यह महज तनाव कम करने या समय बिताने का साधन लगता है। लेकिन तंबाकू में मौजूद निकोटीन इतनी तेजी से शरीर और दिमाग पर असर डालती है कि कुछ ही दिनों में व्यक्ति इसके बिना असहज महसूस करने लगता है। युवाओं के लिए सिगरेट हाथ में पकड़ना मानो आत्मविश्वास या परिपक्वता की निशानी बन जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह धीरे-धीरे शरीर के प्रत्येक अंग को क्षतिग्रस्त करने वाली आदत है। धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग, श्वसन संबंधी विकार और अनेक अन्य बीमारियों का कारण है।
इसके अलावा यह त्वचा की गुणवत्ता घटाता है, समय से पहले बुढ़ापा लाता है और प्रजनन क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसी तरह शराब का सेवन भी युवाओं के जीवन में मॉडर्न लाइफस्टाइल का प्रतीक बन चुका है। जन्मदिन, पार्टी, प्रमोशन या कोई भी खुशी का अवसर अक्सर शराब के बिना अधूरा माना जाने लगा है। युवाओं के लिए यह एक सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन गया है। लेकिन शराब शरीर और मन दोनों पर गंभीर दुष्प्रभाव डालती है। लंबे समय तक शराब का सेवन करने से लिवर सिरोसिस, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक और विभिन्न प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा असर पड़ता है अवसाद, चिंता और आक्रामक व्यवहार शराब की लत के कारण आम हो जाते हैं। कई बार यह लत इतनी गहरी हो जाती है कि व्यक्ति अपने रिश्तों, शिक्षा और करियर तक को दांव पर लगा देता है। धूम्रपान और शराब की संस्कृति केवल स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि समाज पर भी गहरा प्रभाव डालती है। सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण शराब के नशे में गाड़ी चलाना है। नशे की स्थिति में लिए गए निर्णय अक्सर गलत साबित होते हैं, जिससे न केवल व्यक्ति स्वयं बल्कि उसका परिवार और समाज भी प्रभावित होता है।
इसके अलावा, यह आदतें आर्थिक बोझ भी बढ़ाती हैं। एक औसत युवा हर महीने सिगरेट और शराब पर इतनी राशि खर्च कर देता है, जिससे उसकी पढ़ाई, करियर या भविष्य की योजनाओं में निवेश किया जा सकता था।मीडिया और विज्ञापनों का योगदान भी इस संस्कृति को बढ़ावा देने में अहम रहा है। फिल्मों में नायक को सिगरेट पीते या शराब पीते दिखाना मानो एक ग्लैमरस छवि प्रस्तुत करना है। सोशल मीडिया पर भी विभिन्न ब्रांड्स अपनी मार्केटिंग रणनीति में युवाओं को लक्ष्य बनाते हैं।
इस सबके बीच एक युवा यह मान बैठता है कि अगर वह धूम्रपान या शराब नहीं करता तो शायद वह समूह का हिस्सा नहीं बन पाएगा। यह मानसिक दबाव कई बार अधिक खतरनाक साबित होता है। हालांकि, यह भी सच है कि धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है। कई स्वास्थ्य संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और शैक्षणिक संस्थानों ने इस दिशा में प्रयास शुरू किये हैं। तंबाकू और शराब से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। कुछ स्थानों पर तो युवाओं के लिए परामर्श केंद्र भी खोले गए हैं, जहां उन्हें स्वस्थ विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
योग, ध्यान, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों को अपनाकर तनाव कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में परिवार की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। अगर माता-पिता स्वयं स्वस्थ जीवनशैली अपनाते हैं और बच्चों के साथ खुलकर संवाद करते हैं तो युवाओं को धूम्रपान और शराब जैसी आदतों से दूर रखना आसान हो सकता है। शिक्षा प्रणाली में भी जीवन कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे बच्चों को शुरूआत से ही यह समझाया जा सके कि असली आत्मविश्वास और आधुनिकता नशे में नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली में है।
धूम्रपान और शराब का आकर्षण भले ही क्षणिक सुख प्रदान करे, लेकिन यह शरीर और मन पर स्थायी क्षति पहुंचाता है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि उनकी वास्तविक पहचान, उनकी प्रतिभा और उनके विचारों में है, न कि एक सिगरेट या शराब के गिलास में। यदि हम समाज को स्वस्थ, सशक्त और प्रगतिशील बनाना चाहते हैं तो युवाओं को इस लत से दूर रखना ही होगा। अंतत: यह कहा जा सकता है कि धूम्रपान और शराब संस्कृति एक सामाजिक चुनौती बन चुकी है, जो युवाओं के स्वास्थ्य, परिवार और भविष्य को गहराई से प्रभावित कर रही है।
इस चुनौती का सामना करने के लिए व्यक्तिगत जागरूकता, पारिवारिक सहयोग, सामाजिक प्रयास और सरकारी नीतियां सभी का योगदान आवश्यक है। जब तक युवा स्वयं यह संकल्प नहीं लेंगे कि वे अपने जीवन को स्वस्थ विकल्पों से भरेंगे, तब तक इस आदत से छुटकारा पाना मुश्किल होगा। लेकिन आशा की किरण यह है कि धीरे-धीरे बदलती सोच और जागरूकता से एक ऐसा समाज संभव है, जहां युवा अपनी ऊर्जा और क्षमता को सिगरेट और शराब में नहीं, बल्कि सृजन, नवाचार और प्रगति में लगायेंगे।