एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव)। आधुनिक विश्व में चीन आज भी अपने पूर्वजों से सीख नहीं ली है। आज की ग्लोबल व्यवस्था में भी चीन अपने पूर्वजों की तरह लुटेरा, सनकी तथा ताकत की तानाशाही की प्रवृति से उबर नहीं पायी है। उन्हें आज भी दुनिया बहसी, दरिंदे तथा चीन की तानाशाही मिटाने के लिए एकजुट है जैसा लगता है। जबकि चीन को याद होना चाहिए कि सिर्फ वह ही अकेला राष्ट्र नहीं जो अपनी आजादी में रक्त बहाया हैं। अगर देखा जाए तो विश्व में आजादी के लिए कोई राष्ट्र सबसे ज्यादा कुर्बानियां दी है। वह अकेला राष्ट्र है इंडिया।
अगर चीन के अंदर सचमुच बर्बरता तथा तानाशाही के अलावा राष्ट्रभक्ति भी जीवित है तो वह इंडिया की इतिहास पढ़े। पता चल जायेगा कि आजादी के लिए किसने सबसे ज्यादा लहू का महासागर बहाया था। आप इसे नहीं समझ सकते, क्योंकि आपकी राष्ट्रभक्ति के दायरे ऐसे हैं। वहां से सिर्फ अपना राष्ट्र ही दिखता है। बाकी के मुल्कों की संप्रभुता सिर्फ लकीरें और मातृभूमि दूसरों की मामूली जमीन के टुकड़े। अरे! जिसे जमीन समझ रहे हैं। उसे मिट्टी के टुकड़े समझते। शायद मिट्टी की अहमियत समझ आती। संप्रभुता से पहचान होती। मगर आप अपनी ताकत, का विकास का, ऐसा चर्बी आंखों में भर रखा है कि मित्र क्या, दुश्मन क्या, अपना कौन। पराया कौन, कुछ भी नहीं दिखती। बस कभी हमें शोषण की गई थी, तो फिर हम भी उन्हीं की तरह आज ताकतवर है सीमा विस्तार क्यों नहीं कर सकते। अरे, भाई यह 19 वीं सदी नहीं 21 वीं सदी है। ग्लोबल विश्व में हर कोई सब जानता है। हंसी आती है बात भले पुरानी हो। मगर सत्य तो सत्य है। तुम तो साम्राज्यवादियों से भी चार कदम आगे निकले। साम्राज्यवादियों के उपनिवेश संबोधन शब्द हटा दिया और जोड़ दिया ‘गुलामी’ यह कहां का और कैसा तुम्हारे सोच ही तरीके हैं तथा संप्रभुता तोड़ने के अपने निर्मम पाप को छुपाने हेतु दूसरों की इतिहासों से भी खेल जाते हो।
साम्राज्यवादी विचारधारा की ग्लोबल सेंटर अमेरिका भी मानवता की एक सीमा को समझती तथा मानती भी है। मगर आप तो साम्राज्यवादी लकीरों को भी बौना कर चुके हो। जहां मानव मानवता की कोई जगह नहीं बस दुनिया में लोग मरते हैं, तो मरे। कटते हैं तो कट जाये। कोई फर्क नहीं। हम तो खुश हैं। अजी जरा ठहरिए यही आप मात खा गये। क्योंकि आप जब दूसरों की इतिहासों के साथ खिलवाड़ कर रहे थे। तब यह भूल गये कि ताकत के दम पर लक्ष्मी को गुलाम बनाया जा सकता है। परंतु इतिहासों पर नहीं। सत्यमेव जयते के तहत सरस्वती चलती है। इतिहासों की सच्चाई को भले ही ताकत तथा धन के दम पर कुछ समयावधि तक छुपाई जा सकती है। लेकिन इतिहासों की सच्चाई को हमेशा-हमेशा के लिए दफनाई नहीं जा सकती। क्योंकि इतिहासकारों की मानें तो जब समय का पहिया घूमता है तो इतिहासों की सच्चाई कब्र से निकलकर जिंदा हो ही जाती है। जिस दिन ऐसा होता है। जिस दिन ऐसा हो जाता है। इतिहासें सच को अपने मरी होने के बावजूद सम्मानित, शानदार, जानदार, दमदार, ताकतवर जगह दे देती है।
कई उदाहरण पड़े हैं विश्व में ऐसें कि जब न्याय की बात विश्व में आयी, इतिहासों के अनगिनत सच्चाई जमीन फाड़कर अपना स्थान पाया। ताकत तो पीढ़ियों का खेल है जो एक सा हर पीढ़ी के पास नहीं रहती। उदाहरण के तौर पर सन 1962 ईस्वी की इतिहासों को आपने अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जो सरकार गलत है। कहा जाता है कि 19वीं सदी की आधुनिक युग में कुछ भी छिपा पाना संभव नहीं। अगर यह सही है तो सन 1962 ईस्वी की चाइना द्वारा सुनियोजित साजिश के तहत इंडिया पर की गयी। हमले की इतिहासों के साथ छेड़ - छाड़ तथा अधूरी क्यों लिखी गयी।
ताज्जुब की बात यह कि विश्व बिरादरी बिना सत्यापन किये, चाइना द्वारा लिखित इतिहास को सही मान लिया। क्या कूरूर चाइना की महिमा मंडल के लिए सत्य को नजरअंदाज की गयी या इंडिया की सादगी तथा संप्रभुता की सत्यता को पचा नहीं पाई दुनिया। चलो कोई बात नहीं। हर राष्ट्रों की अपनी अपनी विवशता है। अपनी अपनी समस्या है। वाह रे! लोकतंत्र जरूरत पड़ने पर हर राष्ट्र तेरी दुहाई देती है और जरूरत पड़ने पर तेरी कफन की भी सौदा कर देती हैं। 1962 ईसवी में जहां पूरी दुनिया शीत युद्ध के कारण दो फाड़ में बटी थी।
कोई भी छोटी घटना कभी भी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी विश्व युद्ध में बदल जा सकती थी। ऐसा नहीं कि इस भयावह स्थिति में भी शांति के प्रयास नहीं किया जाता था। मगर ताकतवर मुल्कों ने इतिहासों को ऐसा तोड़ - मरोड़ किया, कि हर शांति प्रयास हंसी के पात्र बन जाया करती थी। इस समयकाल में चीन अपनी साम्राज्यवादी नीतियों का विस्तार भी किया और उस घटनाक्रम के इतिहास के साथ छेड़छाड़ भी की। ताज्जुब की बात चाइना को कोई ऐसा करने से रोकना तो दूर टोकना को भी अपनी दायित्व नहीं समझा। 1962 ईस्वी में चाइना की करतूत देखिए उसने सर्वप्रथम इंडिया को अपना भाई कहा। भाई के लिए हर त्याग हर लड़ाई में साथ-साथ रहने का वादा किया।
हिंद के एक ही पिता के दो भाई की बखान की। इंडिया के साथ लड़ाई लड़ने से हाय तौबा की और जैसे ही इंडिया भाई की प्रेम के रास्ते पर बढ़ी। वहीं कल तक एक थाली के दो भाई की गुणगान करने वाला चीन कमबख्त पीठ पर छुरा (चाकू) घोंप दी। खुद मारी इंडिया के पीठ पर चाकू और इतिहास में इंडिया को ही साम्राज्यवादी होने का आरोप लगा दिया। जिससे दुनिया की सहानुभूति इंडिया को ना मिल पाये। इसलिए इतिहासों के पन्नों को भी बदल दी गयी। उस समय इंडिया के धांव ऐसे थे कि तन से मिट जाने के बावजूद मन में कैसर की पीड़ा जैसी दर्द मिट ही नहीं रही थी। वेंटिलेशन पर पड़ी हमारी इंडिया जब इस घाव के दर्द से ही नहीं उबर पायी थी। तब इतिहास किसके द्वारा लिखी जा रही थी। उसे देखने की औकात कहां। उसमें शब्द क्या भरे जा रहे हो। इतनी इल्म कहां। जिसका नाजायज फायदा चीन ने उठा ली।
इस विवाद की विषाद बिछाकर कि वह जमीन जिन्हें उसने इंडिया से छीनी है। वह चीन की ही थी। इंडिया उसे कब्जा किए हुए था। जबकि यह सच्चाई नहीं, इतिहास की। यह तो साम्राज्यवादी तथा लुटेरा शब्द चाइना के माथे न लगे, इसलिए यह चाइना की एकतरफा पक्ष है। जबकि सच्चाई यह है कि चाइना की नीतियां इन्हीं दो कमरों में बैठकर बनाई गई है। 1962 ईस्वी समय काल में भारत तुरंत तुरंत ही आजादी पाई थी। गुलामी का ऐसी दौड़ से इंडिया गुजरी थी कि आजादी मिलते ही पार्टीशन हो गया। रक्त न बहे इसके लिए पार्टीशन हुई, फिर भी चारों तरफ रक्त बहते रहने के माहौल में आजादी का सूरज देखा और परंतु चीन ने भी इंडिया की इस लाचारी का फायदा उठा ली। जमीन भी हड़पी इंडिया की। शमशान बनाया इंडिया को। साथ ही साथ इतिहास के पन्नों में इंडिया को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। 1962 कि चीन ने जब देखा कि इंडिया अपने विकास रथ में राष्ट्रवाद का फ्यूल भर रही है। पचा नहीं पाया। झोंक दी इंडिया को एक युद्ध में। ताकि इंडिया टूटे। कमजोर हो। इंडिया के नेतृत्व करता चाइना की दोगली नीति समझ नहीं पाये। जिसकी कीमत इंडिया को अपनी जमीन होकर चुकानी पड़ी।
इंडिया 1947 ईस्वी की आजादी उपरांत सैन्य ताकत से मुंह मोड़ कर विकास के रास्ते पर चल पड़ी। चीन यह जान चुका था कि इंडिया की फौज कमजोर है। बस क्या था। 20 अक्टूबर 1962 को हमला कर दी। चूंकि इंडिया इसके लिए न मानसिक न ही सैन्य रूप से तैयार थी। फिर भी 25-50 गोलियां लेकर इंडिया के सपूतों ने उनका डटकर मुकाबला किया। जहां चीन के सैनिक 25-50 गोलियों चलाकर अपने हथियारों की छमता नाप कर चली थी। इंडिया के बेटे 25-50 गोलियां तथा 56 इंच का सीना गोलियों को झेल लेने को, फूलाकर युद्ध किया। जो सब जानते थे कि यह युद्ध तो एक शेर तथा बकरी के बच्चे मेमनों की तरह ही है। जहां बेचारी इंडिया के साथ जगधन पाप की जा रही है। फिर भी इंडिया के सपूतों ने चीन के गोलियों का जवाब अपने अपने सीने को आगे कर की। उनके साथ युद्ध की सप्लाई लाइन भी इंडिया विकसित नहीं कर पाई थी। युद्ध लड़ने के लिए हथियार तथा भोजन सैनिकों को मुहैया करना पहली प्राथमिकता होती है, जो इंडिया की नहीं थी।
चीन हमें मार दे। मगर हम मां के सपूत तुम्हारे हवाले छोड़ कर अपनी धरती को पीछे नहीं जायेंगे। इस सोच को जिंदा रखने हेतु कई कई दिनों तक, हमारी भूखी फौज, अपने चमड़े की बेल्ट, अपने ही शहीदों के कच्चे मांस तक को खाना मंजूर की ताकि वह उस समय तक जीवित रहे। जब तक निर्दयी चाइना कि हमलावर गोली न मार दे। भारतीय फौज हमेशा अजय रही है। हमारे पास हथियार नहीं तो क्या हम पर कर्ज तो जरूर है मातृभूमि का वीरगति हो जायेंगे। मगर पीठ नहीं दिखायेंगे कायरता की कलंक को माथे पर नहीं लगने देंगे। ऐसा पापी राष्ट्र चाइना जिसके पास मानवता नाम की कोई चीज नहीं है। वह इस बर्बर नरसंहार को अपने युद्ध जीतने की गाथा गढ़ कर सुनाती है। जरूरत पड़ने पर दुनिया को 1962 ईस्वी की अपनी जीत का धौंस देती है। ऐसा कब तक चलेगा। इतिहास के साथ छेड़ छाड़ ऐसा अपराध को बंद करनी होगी। वरना हर युग में संप्रभुता के कारण युद्ध के काले बादल मंडराते रहेंगे। जय हिंद..(लेखक कोडरमा, झारखंड निवासी और स्वतंत्र लेखक हैं।)