एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद झारखंड सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में अधिक मास जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। अत्यंत पुण्यदायी और आध्यात्मिक साधना का विशेष काल माना जाता है। इस वर्ष पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा 31 मई दिन रविवार को मनायी जायेगी।
यह पूर्णिमा भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की आराधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। पुरुषोत्तम मास लगभग 3 वर्ष के अंतराल पर आता है। हिंदू पंचांग चंद्र और सौर गणना पर आधारित है। दोनों के बीच समय के अंतर को संतुलित करने के लिए अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब इस अतिरिक्त मास को कोई देवता स्वीकार नहीं कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर पुरुषोत्तम मास घोषित किया। तभी से यह मास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है।
पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है क्योंकि यह साधना, जप, तप, दान और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ अवसर प्रदान करती है। इस दिन प्रात:काल पवित्र नदी अथवा घर में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करने, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने तथा सत्यनारायण कथा सुनने या कराने का विशेष महत्व बताया गया है।
श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान से सुख, समृद्धि और कल्याण की प्रार्थना करते हैं, इस पावन अवसर पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। अन्नदान, वस्त्रदान, जलदान, गौसेवा तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा पर किया गया दान कई गुना फलदायी माना जाता है। पुरुषोत्तम पूर्णिमा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर धर्म, भक्ति, सेवा और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करना है।
यह पर्व हमें संयम, सदाचार, करुणा और ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश देता है। इस दिन किये गये जप, तप, पूजा और सत्कर्म व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
अत: पुरुषोत्तम मास पूर्णिमा केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, पुण्य संचय और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ एवं पावन अवसर है। श्रद्धा और विश्वास के साथ इस दिन की गयी उपासना जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करने वाली हैं।
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