झारखंड
आरएसएस इकलौता संगठन था, जिसने कभी तिरंगा स्वीकार नहीं किया : बृंदा करात
ABN Bureau
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14 Aug, 2022
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टीम एबीएन, कोडरमा। आरएसएस इकलौता संगठन था, जिसने कभी तिरंगा को स्वीकार नहीं किया था। उनका कहना था किस्मत से जो सत्ता में आ गए हैं। वे हमारे हाथों में तिरंगा भले ही थमा दे, लेकिन हिंदु उसे कभी भी न अपना सकेंगे न ही तिरंगे को उचित सम्मान दे सकेंगे। उक्त बातें देश की जानी-मानी वामपंथी नेत्री और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पोलिट ब्यूरो सदस्य बृंदा करात ने पार्टी की राज्य कमेटी की दो दिवसीय बैठक के लिए कोडरमा दौरे के दौरान पत्रकारों से कही। उन्होंने मोदी सरकार की हर घर तिरंगा लगाने की योजना पर खुलकर बात करते हुए कहा कि भारत के स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर, लाखों परिवार असंख्य शहीदों और उन महिलाओं और पुरुषों को सलाम करते है, जिनके संघर्ष और बलिदान ने हमारी स्वतंत्रता को संभव बनाया। तिरंगा को एक नारे या महज आयोजन से आगे ले जाने के लिए अपने स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास के पन्नों को पलटना महत्वपूर्ण है, कुर्बानियों को जानने की जरूरत है। तिरंगा भारत के संविधान से निकटता से जुड़ा हुआ है। संविधान सभा ने राष्ट्रीय ध्वज पर निर्णय लेने के लिए जून 1947 में 12 सदस्यीय तदर्थ समिति की स्थापना की जिसे फ्लैग कमेटी का नाम दिया गया। इसके अध्यक्ष थे डॉ राजेंद्र प्रसाद और सदस्यों में डॉ बाबासाहेब अंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू, सी राजगोपालाचारी, के एम पन्निकर, फ्रैंक एंथोनी, पट्टाभि सीतारमय्या, हीरालाल शास्त्री, बलदेव सिंह, सत्यनारायण सिंह और एस एन गुप्ता शामिल थे। चरखे को अशोक चक्र से बदलने के महत्वपूर्ण संशोधन के साथ इस कमिटी को तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अंगीकृत कराने के लिए प्रस्ताव देने का कार्यभार सौंपा गया था। भले ही तिरंगे को पहली बार कांग्रेस पार्टी ने 1931 के अपने प्रस्ताव में अपनाया था, लेकिन व्यवहार में, यह कांग्रेस पार्टी से आगे निकल गया और स्वतंत्रता की लड़ाई में भारतीयों का मुख्य ध्वज बन गया। ब्रिटिश साम्राज्य ने इस झंडे को नष्ट करने के लिए अपनी सारी शक्ति का इस्तेमाल किया, लेकिन देश वासियों ने अपने संघर्ष और संकल्प से इसे बचाए रखा। बेशक स्वतंत्रता की लड़ाई में अन्य झंडों के नीचे और महत्वपूर्ण धाराएं भी थीं। उदाहरण के लिए, ब्रिटिश राज और उनके मूल सहयोगियों के खिलाफ कम्युनिस्टों और किसानों ने लाल झंडा पकड़ लिया था, जिसे वे अपने संघर्ष का प्रतीक मानते थे। भारत में पहली बार लाल झंडा 1923 में मद्रास में एक श्रमिक रैली में आया था और देश के सभी कोनों में फैल गया था। संविधान सभा में चर्चा का एक विषय यह भी था कि ध्वज के रंग किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते, यह एक धर्मनिरपेक्ष ध्वज था। जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज के लिए प्रस्ताव पेश करते हुए कहा था। कुछ लोगों ने इसके महत्व को गलत समझा, इसे सांप्रदायिक दृष्टि से देखा है लेकिन मैं कह सकता हूं कि जब यह ध्वज तैयार किया गया था तो इसके साथ कोई सांप्रदायिक तथ्य नहीं जुड़ा था। एक अन्य सदस्य शिबन लाल सक्सेना ने कहा झंडे के तीन रंगों का कोई सांप्रदायिक महत्व नहीं था। चर्चा में, झंडे में रंगों के अर्थ की कई रचनात्मक व्याख्याएं थीं, त्याग-बलिदान का केसरिया से, प्रकृति की निकटता हरे से और अहिंसा और शांति के प्रतीक के रूप में सफेद का। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी व्याख्या में इसे इस तरह से रखा,"यह झंडा हमें बताता है कि सतर्क रहो, चलते चलो, आगे बढ़ो, एक स्वतंत्र, लचीले, संवेदनशील, सभ्य, लोकतांत्रिक सामाज का निर्माण करो जिसमें ईसाई, सिख, मुस्लिम, हिंदु, बौद्ध सभी को एक सुरक्षित आश्रय मिले। चर्चा में तीसरा पहलू सामाजिक न्याय, उत्पीड़न और भूख से मुक्ति का था। आजादी के 75 साल बाद भी यह बहुत दुखद स्थिति है कि देश के लाखों परिवार बेघर हैं, भूमिहीन हैं, अल्प आय के साथ क्योंकि आक्रामक पूंजीवाद ने विकराल असमानताओं को जन्म दिया है, जो संविधान सभा के अपेक्षाओं के विपरीत है और इन नीतियों के खिलाफ दूसरे स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत है। तीन रंगों को अपशकुन मानने वाली आरएसएस, तीन रंगों वाले तिरंगे को निश्चित रूप से अपशकुनी और देश के लिए हानिकारक मानती थी। आरएसएस दरअसल अपने संगठनिक भगवा ध्वज को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में चाहता था और मनुस्मृति को भारत के संविधान का आधार बनाना चाहता था। स्वतंत्र भारत के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के दो दिनों के अंदर ही आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। एक साल बाद, प्रतिबंध हटाने के लिए आरएसएस पर लगाए गए कई शर्तों में से राष्ट्रीय ध्वज को बिना शर्त स्वीकार करना भी एक अनिवार्य शर्त था। गृह सचिव एचवीआर अयंगर ने मई 1949 में आरएसएस प्रमुख श्री गोलवलकर को लिखा था राष्ट्रीय ध्वज को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर राजसत्ता को अंगीकार करने हेतु आपका लिखित आश्वासन देश को संतुष्ट करने के लिए अनिवार्य होगा। आरएसएस के पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इस इतिहास को याद दिलाने पर आरएसएस कहता है, इस मुद्दे का राजनीतिकरण मत करो, लेकिन वह अपनी गलती नहीं मानता। इसके विपरीत हाल ही में आरएसएस के एक नेता कल्लादका प्रभाकर भट ने कहा, अगर हिंदू धर्म के मानने वाले एकजुट हो जायें तो आज भी भगवा ध्वज अपना राष्ट्रीय ध्वज बन सकता है।
माकपा नेता बृंदा करात ने कहा कि तिरंगा आजाद भारत में भारत के बुनियादी मूल्यों का प्रतीक है और आरएसएस के लिए अभिशाप। स्वतंत्रता संग्राम के मूल में देशभक्ति थी, जो सभी धर्मावलंबियों के धर्मनिरपेक्ष नागरिकता से नभ-नाल की तरह जुड़ी हुई थी। हर घर तिरंगा हमारे लिए आज सत्ता और उनके आका, जो स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के फूट डालो और राज करो की नीति पर चल कर आज इन मूल्यों पर बुरी तरह से हमलावर हैं, से इन मूल्यों को बचाने और बढ़ाने का संकल्प होना चाहिए। जब हम तिरंगा फहराते है तो उसमें संविधान की प्रस्तावना भी निहित होती है जो हम इस या उस धर्म के लोग से नहीं बल्कि "हम भारत के लोगह्व से आरंभ होती है।
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