गुमला। किसको सुनाउं हाल दिले बेकरार का बुझता हुआ चिराग हूं अपने मजार का... घाघरा प्रखंड के विमरला पंचायत के बियार टोली निवासी 55 वर्षीय अगापित केरकेट्टा पिछले पांच वर्षों से एक पेड़ के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है। बारिश से उसका घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। जिसके बाद उसका आशियाना खुले आसमान के नीचे एक पेड़ की छांव में बन गया। घर के सभी सामान लेकर वह पांच वर्षों से पेड़ के नीचे रह रहा है। आंधी आये, बारिश हो या फिर वज्रपात हो उसके जीवन का सहारा पेड़ की छांव ही है। प्रखंड प्रशासन को घर बनाने के लिए दी गयी अर्जी भी आज तक स्वीकार नहीं हुई। जिसके कारण बदनसीबी का जीवन अगापति जीने को विवश है। एक पेड़ की डाली में बैग के सहारे उसके कपड़े टंगे हुए हैं तो दूसरे स्थान पर बोरों में भरकर जीवन यापन के लिए अनाज रखा है। भोजन भी लकड़ियां चुनकर बनाता है। परिवार में कोई सहारा भी नहीं है। एक बेटा और एक बेटी है जो छह वर्ष पूर्व ही कमाने की बात कहकर निकले थे, वे आज तक वापस नहीं लौटे। अगापति को यह भी पता नहीं है कि उनकी संतानें कहां हैं? संतानों की आस में उसकी आंखें भी अब पथरा गयी हैं। जीवन के इस भंवर में वह जीवन यापन की सोचे या फिर बच्चों की तलाश करे। न घर है और न ही घाट। किसके भरोसे सामान छोडेÞ, क्योंकि यह तो घोर कलयुग है। विडंबनाओं से भरे इस जीवन में अगापति किसी इंसानियत के देवता का इंतजार कर रहा है जो उसके बेजान पड़े जीवन में खुशियां लौटा सके। पांच वर्ष गुजर गये न प्रखंड प्रशासन ने उसकी इस र्दुदशा की ओर ध्यान दिया और न ही किसी समाजसेवी की नजरें उस तक गयी। जीवन की नाव किसी तरह खींचकर इस भवसागर से पार होने की ही इच्छा शायद उसकी बच गयी है। बियार टोली के ग्रामीणों ने श्रमदान कर व सामूहिक मदद कर उसके घर की निर्माण के लिए एकजुटता भी दिखायी थी। लेकिन गांव वाले अपने निर्णय को अमलीजामा नहीं पहना सके। जिसके कारण अगापति आज भी वन्य प्राणियों की भांति जीवन यापन कर रहा है। गांव के कई ग्रामीणों ने कहा कि वे अगापति की इस कष्टकारी जीवन से दुखी हैं। सरकार लोगों को प्रधानमंत्री आवास दे रही है। अगर इस गरीब को भी आवास योजना का लाभ मिल जाता तो शायद उसका जीवन अच्छा होता। परिवार के सदस्य भी कहां हैं किसी को पता नहीं है।