टीम एबीएन, कोडरमा। ब्रिटिश राज के जमाने मे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान देश की जनता की आवाज को कुचलने के लिए बने 1870 के राजद्रोह कानून की धारा 124 ए पर उच्चतम न्यायालय के फैसले का मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने स्वागत किया है। ज्ञात हो कि बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस हिमा कोहली की तीन सदस्यीय बेंच द्वारा दिए गए आदेश में कहा गया है कि जब तक कोर्ट इस बर्बर धारा की समीक्षा पूरी नहीं करता है। तब तक राजद्रोह के सभी मामलों मे सुनवाई तत्काल रोकी जाय, इस धारा के तहत जो भी जेल में बंद हैं, वे जमानत के लिए आवेदन दे सकते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें अब इस धारा मे किसी को भी गिरफ्तार नहीं कर सकती है। माकपा के राज्य सचिवमंडल सदस्य संजय पासवान ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केन्द्र सरकार के महाधिवक्ता की पूरी कोशिश थी कि केंद्रीय सरकार द्वारा इस धारा की समीक्षा के नाम के नाम पर सुप्रीम कोर्ट से राहत ले ली जाय लेकिन उच्चतम न्यायालय ने संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए स्वयं इस बर्बर कानून की समीक्षा करने का एलान किया है। माकपा सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत करता है। क्योंकि भाजपा के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार मे बैठे सत्ताधारियों के द्वारा लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते हुए अपने विरोधियों का दमन करने के लिए इस कानून का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा था। संजय पासवान ने कहा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में पिछले आठ सालों में 400 लोगों पर राजद्रोह का मुकदमा किया गया है, जिस पर अभी तक कोई चार्जशीट दाखिल नहीं किया गया है। मात्र छह लोगों को सजा हुई है। सीपीएम का मानना है कि आजाद भारत में इस कानून का कोई औचित्य नहीं है। इसलिए इस कानून को कानून के किताब से पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए।