टीम एबीएन, कोडरमा। शिव उपासना का पर्व महाशिवरात्रि प्रकृति का संरक्षण का संदेश देता है। भगवान शिव के परिवार का प्रकृति से विशेष लगाव और संबंध माना जाता है। उक्त बातें मां तारा ज्योतिष संस्थान के आचार्य अनिल मिश्रा ने कही। उन्होंने कहा कि भगवान शिव का वास पर्वत और जंगलों में माना गया है। यह हमें प्रकृति के साथ जुड़ने का संदेश देता है। भगवान शिव का जंगलों और पहाड़ों से संबंध बताता है की प्रकृति हमारे लिए ही नहीं बल्कि देवताओं के लिए भी महत्वपूर्ण था। ऐसे में शिवरात्रि का पर्व हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव के परिवार का प्रकृति से विशेष प्रेम समझा जाता है। भगवान शिव के गले में सांप होता है और सांप को किसानों का मित्र समझा जाता है। यह फसलों में लगने वाले कीड़े- मकोड़े को नष्ट कर उसकी सुरक्षा करते हैं। जबकि भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा और जटा में गंगा समाहित है। यानी समस्त संसार को भगवान शिव से जल की प्राप्ति होती है। आचार्य अनिल मिश्रा ने कहा कि शिव के द्वारा अपनी जटाओं में गंगा को बांधे रखना प्रकृति में जल संरक्षण के महत्व को दर्शाता है। दूसरी ओर भगवान शिव की सवारी बैल है जो खेती-बारी के कामों में किसानों की मदद करते हैं। यह उनकी संपत्ति होती है। जबकि मां भवानी की सवारी शेर है। शेर भी पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही वजह है कि वन विभाग के द्वारा वन्य प्राणियों खासकर शेर और उसके अन्य प्रजातियों को बचाने का प्रयास किया जाता है। चूहा भगवान शिव के परिवार का एक हिस्सा है। यह सिद्धिदाता गणेश की सवारी है। वहीं भगवान कार्तिकेय की सवारी मोर है। मोर, चूहा और सांप प्रकृति के अभिन्न अंग हैं। प्रकृति की सुरक्षा और उसको सुंदरता प्रदान करने में ये सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार भगवान शिव का परिवार प्रकृति संरक्षण, संवर्धन और प्रकृति प्रेम का संदेश देता है। भगवान शिव के वैवाहिक वर्षगांठ के रूप में मनाया जाने वाला शिवरात्रि का त्यौहार प्रकृति और मानव जीवन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।