टीम एबीएन, हजारीबाग। झारखंड में भाषा विवाद पर नव झारखण्ड फाउंडेशन के केंद्रीय अध्यक्ष किशोरी राणा ने बंसी लाल चौक स्थित अपने कार्यालय में प्रेस वार्ता आयोजित की। पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए श्री राणा ने कहा की किसी भी राज्य की मूल भाषा वहां के रैयतों के द्वारा बोली जाने वाली मातृभाषा होती है। झारखण्ड में झारखंड के बाहर की भाषा भोजपुरी, मगही, अंगिका, ऊर्दू, बंगला, उड़िया को क्षेत्रीय भाषा के रूप में संवैधानिक दर्जा देने के फलस्वरूप यहां के मूल-रैयतों की मातृभाषा विलुप्त और हाशिए पर जाना शत प्रतिशत तय हो गया है। भाषायी अतिक्रमण को प्रोत्साहित कर नियोजन नीति में पूरे देश के अभ्यर्थियों के लिए तुष्टिकरण के तहत झारखण्ड में किसी भी तिथि में आकर दसवी, बारहवीं उत्तीर्ण करने वालों के लिए द्वार खोलने से मूल रैयत झारखण्डियों की भावना के विपरित हक अधिकार से वंचित होना सुनिश्चित हो चुका है। राज्य सरकार को युवाओ के भविष्य से खेलने की इजाजत नहीं दी जाएगी। सरकार ने एक तरफ इस नियम को लागू कर दिया है वही दूसरी ओर धारा 144 लगा दिया गया है ताकि लोग इसका विरोध न कर सके। श्री राणा ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार स्थानीय भाषा और यहां के मूल निवासियों से खिलवाड़ न करे व अतिशीघ्र इस नियमावली को निरस्त करे अन्यथा हम लोग चुप नहीं बैठेंगे। साथ ही कहा कि झारखण्ड के हर ज़िले में उर्दू भाषा अनिवार्य कर दिया गया है। ये सरासर गलत है। सरकार तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है। जनता में आक्रोश पनप रही है। सरकार को इसका खामियाजा भुगतना होगा।