टीम एबीएन, रांची। झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग द्वारा 18 फरवरी, 2022 को निकाली गई अधिसूचना में झारखंड प्रांत के सभी जिलों में मैट्रिक तथा इंटरमीडिएट स्तर की प्रतियोगिता परीक्षाओं में जिला स्तरीय पदों के लिए उर्दू भाषा को क्षेत्रीय भाषा के रूप में रखा गया है, जो असंवैधानिक है। यह बात विश्व हिन्दू परिषद, झारखण्ड प्रांत मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहू ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कही है। डॉ बिरेन्द्र साहू ने कहा की उर्दू शब्द मूलतः तुर्की भाषा है तथा इसका अर्थ है- शाही शिविर या खेमा (तम्बू)। तुर्कों के साथ यह भाषा भारत में आया है।उर्दू भाषा दिल्ली सल्तनत (1206 -1526) और मुगल साम्राज्य (1526 -1858) के दौरान मुस्लिमों के बीच प्रयोग होती थी। जब दिल्ली सल्तनत ने दक्कन पठार पर दक्षिण में विस्तार किया, तब इस भाषा को दक्षिण भारत के मुस्लिमों द्वारा भी बोली जाने लगी। उन्होंने कहा जनजातिय एवं क्षेत्रीय भाषा अपने-अपने क्षेत्र का स्थानीय, प्राचीन व परम्परागत भाषा होती है। झारखंड प्रदेश में क्षेत्रीय भाषा के रूप में मुख्यतः नागपुरी, खोरठा, पंचपरगानिया एवं कुरमाली है, जो अति प्राचीन भाषा है। जबकि उर्दू एक विदेशी भाषा है। विदेशी आक्रांताओं के द्वारा देश पर आक्रमण के पश्चात साम्राज्य स्थापित कर अपने भाषा को भारत में लागू करने का प्रयास किया गया था। ऐसे में उर्दू किसी भी मायने पर झारखंड के लिए क्षेत्रीय भाषा नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा, हमें यह भी ज्ञात होना चाहिए कि मुस्लिम जिस क्षेत्र में रहते हैं, वे उसी क्षेत्र का क्षेत्रीय भाषा बोलते हैं। यदि झारखंड के मुस्लिम अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो फिर उनके लिए उर्दू भाषा को क्षेत्रीय भाषा घोषित करना कहां का प्रावधान है? उन्होंने कहा झारखंड सरकार की तुष्टीकरण की नीति के तहत ही इस तरह के प्रावधानों को झारखंड में लाने का दुस्साहस किया जा रहा है। ऐसे असंवैधानिक अधिसूचना का विश्व हिंदू परिषद विरोध करती है। झारखंड सरकार इस अधिसूचना को शीघ्र निरस्त करें, अन्यथा बाध्य होकर विश्व हिंदू परिषद आंदोलनात्मक कार्यक्रम चलाएगी।