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पलामू : लाल इमारत में दफन होती शिक्षा की विरासत, प्रशासन बेखबर

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पलामू : लाल इमारत में दफन होती शिक्षा की विरासत, प्रशासन बेखबर
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  • 90 साल पुरानी शैक्षणिक विरासत की बदहाली: 980 विद्यार्थियों का भविष्य आठ शिक्षकों के भरोसे 
  • ब्रिटिश काल में स्थापित बक्सी उच्च विद्यालय खंडहर में तब्दील, न शौचालय, न पेयजल और न पर्याप्त शिक्षक; सुंदरीकरण के नाम पर लाखों खर्च लेकिन स्थिति भयावह, कैसे सुधरेगी हुसैनाबाद की शिक्षा। 

एबीएन न्यूज नेटवर्क, हुसैनाबाद (पलामू)। जिस विद्यालय ने कभी पलामू को शैक्षणिक पहचान दी, जहां से पढ़कर विद्यार्थी राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद तक पहुंचे, आज वही विद्यालय अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। हुसैनाबाद का ऐतिहासिक बक्सी उच्च विद्यालय प्रशासनिक उदासीनता और शिक्षा विभाग की अनदेखी का ऐसा उदाहरण बन गया है, जहां 980 विद्यार्थियों का भविष्य महज आठ शिक्षकों के भरोसे है। 

विद्यालय में न पर्याप्त कक्षाएं हैं, न शौचालय की समुचित व्यवस्था, न शुद्ध पेयजल और न ही परिसर की नियमित देखभाल। कभी क्षेत्र की शैक्षणिक पहचान रहा यह संस्थान आज अपनी ऐतिहासिक इमारत और बुनियादी सुविधाओं को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। विद्यालय की बदहाली केवल भवन की जर्जर स्थिति तक सीमित नहीं है। यह उस सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल है, जो शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता सुधार के लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं तथा बजट की घोषणाएं तो करती है, लेकिन दशकों पुराने शैक्षणिक संस्थानों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में विफल दिखाई देती है। 

झारखंड गठन के 26 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। सरकार विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य को राज्य की प्राथमिकताओं में शामिल करती रही है, लेकिन हुसैनाबाद का यह विद्यालय पूछ रहा है कि विकास की योजनाओं का लाभ आखिर उन संस्थानों तक क्यों नहीं पहुंचता, जिन्होंने पीढ़ियों को शिक्षित करने में अपनी भूमिका निभायी है? विद्यालय की स्थापना वर्ष 1935 में हुई थी। इसके पहले प्रधानाध्यापक मेघनारायण राम ने 1935 से 1942 तक विद्यालय का नेतृत्व किया था। 

इस संस्थान का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि तमिलनाडु के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय भीष्म नारायण सिंह ने यहीं से अपनी माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की थी। यह तथ्य विद्यालय की शैक्षणिक विरासत और पलामू के गौरवशाली इतिहास का उदाहरण है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस संस्थान ने समाज को शिक्षित नेतृत्व दिया, आज उसी संस्थान में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझना पड़ रहा है। विद्यालय की वर्तमान स्थिति सरकारी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल है। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यहां लगभग 980 विद्यार्थी नामांकित हैं, जबकि पढ़ाई के लिए मात्र 10 कमरे ही उपलब्ध है, और शिक्षकों की संख्या मात्र आठ है। विद्यालय मे हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और जीवविज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों के लिए भी स्थायी शिक्षकों की उपलब्धता नहीं है। ऐसे में यह समझना कठिन नहीं है कि विद्यार्थियों को निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा किस तरह मिल पा रही होगी। एक शिक्षक पर विद्यार्थियों की संख्या का दबाव, विषय विशेषज्ञों की कमी और सीमित कक्षाओं की उपलब्धता का सीधा असर पढ़ाई पर पड़ना स्वाभाविक है। 

यहां सबसे बड़ा प्रश्न केवल शिक्षकों की संख्या का नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता का भी है। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर प्रत्येक विषय की अपनी शैक्षणिक आवश्यकता होती है। हिंदी और अंग्रेजी भाषा के साथ संस्कृत तथा जीवविज्ञान जैसे विषयों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की जरूरत होती है। यदि इन विषयों के स्थायी शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं तो विद्यार्थियों की विषयगत समझ, परीक्षा की तैयारी और आगे की पढ़ाई प्रभावित होना तय है। ऐसे में ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के सामने निजी ट्यूशन या दूसरे संसाधनों का सहारा लेने की चुनौती खड़ी होती है।  

विद्यालय की भौतिक स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। परिसर में झाड़ियां उग आई हैं और मैदान की नियमित सफाई नहीं होने के कारण उसका उपयोग भी प्रभावित हो रहा है। विद्यार्थियों के लिए शौचालय और शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव विद्यालय की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता किसी विद्यालय में वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी अनिवार्य आवश्यकता है। 

पेयजल व्यवस्था के लिए राशि खर्च की गयी और परिसर में नलकूप भी लगाए गए, लेकिन विडंबना यह है कि नल से पानी नहीं निकलता। प्रधानाध्यापक के अनुसार, विद्यालय में कार्यरत अनुसेवक का विभाग द्वारा छह माह पूर्व स्थानांतरण कर दिया गया था। इसके बाद विद्यालय में इस पद पर किसी अन्य कर्मचारी की तैनाती नहीं हुई है। इस समस्या से जिला प्रशासन को पत्राचार के माध्यम से अवगत भी कराया गया है, लेकिन अब तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। 

विद्यालय के मैदान के सौंदर्यीकरण के लिए नगर पंचायत की ओर से स्ट्रीट लाइट लगायी गयी थी और पेवर ब्लॉक बिछाये गये थे। लेकिन बाद में शिक्षा विभाग ने उसी परिसर में चहारदीवारी और नये प्रवेश द्वार (तोरण द्वार) के निर्माण की कार्ययोजना तैयार करायी, जो वर्तमान में अधूरी पड़ी है। परिणामस्वरूप, पहले से लगाए गए स्ट्रीट लाइट और बिछाये गये पेवर ब्लॉक अब मलबे में तब्दील हो चुके हैं। इस मामले में नगर के नागरिकों की ओर से जिला शिक्षा विभाग को जांच के लिए आवेदन भी दिया गया था, लेकिन उस पर भी अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। 

इस पूरी स्थिति से विद्यालय के विकास कार्यों में विभागीय समन्वय की कमी, योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही और सार्वजनिक धन के उपयोग की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। सवाल यह भी है कि जिन परिवारों के पास अतिरिक्त खर्च करने की क्षमता नहीं है, उनके बच्चों की शैक्षणिक क्षति की भरपाई कौन करेगा? विद्यालय की भौतिक स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। 

परिसर में झाड़ियां उग आयी हैं और मैदान की नियमित सफाई नहीं होने से उसका उपयोग भी प्रभावित हो रहा है। छात्रो के लिए शौचालय और शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव विद्यालय के संचालन पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। विशेषकर छात्राओं के लिए सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय का न होना उनकी शिक्षा और नियमित उपस्थिति को प्रभावित कर सकता है। स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी किसी विद्यालय की वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी अनिवार्य आवश्यकता है। 

इस विद्यालय की सबसे बड़ी पहचान उसकी लाल ईंटों से बनी ऐतिहासिक इमारत है। कभी मजबूती और स्थापत्य की मिसाल रही यह इमारत अब रखरखाव के अभाव में जर्जर होती जा रही है। भवन की छत पर पेड़-पौधे उग आए हैं और दीवारों में टूट-फूट दिखाई देती है। तस्वीरों में दिखाई देने वाली स्थिति यह संकेत देती है कि समय रहते संरचनात्मक जांच और मरम्मत नहीं हुई तो भवन का नुकसान और बढ़ सकता है। यह केवल एक पुरानी इमारत का क्षरण नहीं, बल्कि पलामू की शैक्षणिक विरासत के संरक्षण से जुड़ा प्रश्न है। 

विडंबना यह है कि पिछले वर्षों में नगर पंचायत की ओर से विद्यालय के सुंदरीकरण के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसके बावजूद विद्यालय परिसर की मौजूदा स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता। यदि वास्तव में इतनी राशि खर्च हुई है तो उसका विवरण, कार्य की प्रकृति, स्वीकृत राशि और पूर्णता प्रमाणपत्र सार्वजनिक होना चाहिए।

सुंदरीकरण के नाम पर खर्च और धरातल पर मौजूद स्थिति के बीच अंतर है तो उसकी जांच भी आवश्यक है। हालांकि केवल वर्तमान बदहाली के आधार पर वित्तीय अनियमितता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन सार्वजनिक धन के उपयोग का हिसाब मांगना नागरिकों का अधिकार है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। विद्यालय के ऐतिहासिक भवन का संरक्षण और वर्तमान शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार दो अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। 

भवन की मरम्मत कर देने से विद्यार्थियों को शिक्षक नहीं मिलेंगे और शिक्षकों की नियुक्ति से जर्जर भवन, शौचालय तथा पेयजल की समस्या अपने आप दूर नहीं होगी। इसलिए शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और नगर पंचायत को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के अनुसार समन्वित कार्ययोजना तैयार करनी होगी। जिला शिक्षा पदाधिकारी के कार्यालय को सबसे पहले विद्यालय में स्वीकृत और कार्यरत शिक्षकों के पदों की समीक्षा करनी चाहिए। विषयवार रिक्तियों की जानकारी लेकर आवश्यक शिक्षकों की नियुक्ति या प्रतिनियुक्ति की व्यवस्था की जाये। 

विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में अतिरिक्त कक्षाओं की जरूरत का आकलन हो। साथ ही विद्यालय की ऐतिहासिक इमारत का तकनीकी सर्वेक्षण कर उसकी सुरक्षा और मरम्मत के लिए अलग प्रस्ताव तैयार किया जाना चाहिए। भवन यदि ऐतिहासिक महत्व रखता है तो उसकी मूल संरचना और स्थापत्य को सुरक्षित रखते हुए संरक्षण का काम कराया जाना चाहिए। 

नगर पंचायत को भी विद्यालय परिसर की सफाई, जलनिकासी और आसपास के सार्वजनिक क्षेत्र के रखरखाव में अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी। सुंदरीकरण के नाम पर पूर्व में खर्च की गई राशि का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि किन कार्यों के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ और वास्तव में कौन-कौन से काम पूरे किए गए। उपायुक्त कार्यालय को इन सभी विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर समयबद्ध समीक्षा करनी चाहिए। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बक्सी उच्च विद्यालय को केवल एक सरकारी स्कूल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह हुसैनाबाद और पलामू की ऐतिहासिक शैक्षणिक पहचान का हिस्सा है। लगभग नौ दशक पुराने इस संस्थान से अनेक पीढ़ियों की स्मृतियां जुड़ी हैं। ऐसे संस्थान को बचाना केवल भवन की मरम्मत करना नहीं, बल्कि उस सामाजिक विरासत को सुरक्षित रखना है, जिसने क्षेत्र में शिक्षा की नींव मजबूत की। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन इस विद्यालय की बदहाली को एक सामान्य विभागीय शिकायत मानकर फाइलों में न दबाये। 980 विद्यार्थियों का भविष्य आठ शिक्षकों के भरोसे छोड़ देना और ऐतिहासिक भवन को धीरे-धीरे खंडहर बनने देना किसी भी विकसित शैक्षणिक व्यवस्था की पहचान नहीं हो सकती। सरकार यदि शिक्षा को वास्तव में विकास का आधार मानती है तो बक्सी उच्च विद्यालय जैसे संस्थानों को प्राथमिकता देनी होगी। आखिर जिस विद्यालय ने कभी समाज को शिक्षित नेतृत्व दिया, क्या आज का प्रशासन उसे बचाने की जिम्मेदारी भी नहीं निभा सकता?

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