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सादगी, संघर्ष और समाजसेवा की प्रतिमूर्ति थे प्रो. विष्णुचरण महतो

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सादगी, संघर्ष और समाजसेवा की प्रतिमूर्ति थे प्रो. विष्णुचरण महतो
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  • सादगी, संघर्ष और समाजसेवा की प्रतिमूर्ति थे प्रो. विष्णुचरण महतो
  • 40वीं पुण्यतिथि पर विशेष

मृत्युंजय प्रसाद

टीम एबीएन, रांची। प्रो. विष्णुचरण महतो केवल एक शिक्षाविद्, अधिवक्ता और राजनेता ही नहीं थे, बल्कि वे सादगी, संघर्ष, सामाजिक समर्पण और उच्च आदर्शों के प्रतीक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा, सामाजिक उत्थान, गरीबों के अधिकारों और क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए समर्पित कर दिया था। झारखंड के सामाजिक एवं राजनीतिक इतिहास में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।

साधारण किसान परिवार में जन्म, असाधारण व्यक्तित्व

प्रो. विष्णुचरण महतो का जन्म 23 फरवरी 1926 को रांची जिले के सिल्ली प्रखंड अंतर्गत कांटाडीह गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। आर्थिक परिस्थितियां सामान्य होने के बावजूद बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी और प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। उन्होंने रांची जिला स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए पटना गये, जहां से आईए और बीए की पढ़ाई पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, लेकिन कानून के प्रति विशेष रुचि के कारण पटना में विधि की पढ़ाई पूरी की।

विधि शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनकी नियुक्ति पटना उच्च न्यायालय में हुई, लेकिन वकालत और समाजसेवा के प्रति लगाव उन्हें वापस रांची ले आया। रांची में रहकर उन्होंने वकालत के साथ-साथ छोटानागपुर विधि महाविद्यालय में अध्यापन का कार्य भी किया। वे कानून के गहरे जानकार थे और अपने ज्ञान का उपयोग हमेशा समाज के कमजोर एवं जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए करते थे।

झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका

झारखंड की अलग पहचान और अधिकारों के लिए चले आंदोलन में भी प्रो. महतो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। मरांग गोमके जयपाल सिंह के आह्वान पर वे झारखंड आंदोलन से जुड़े और पूरे समर्पण के साथ आंदोलन में भाग लिया। वे केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि झारखंड के सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई अस्तित्व की रक्षा के लिए भी लगातार प्रयासरत रहे।

उन्होंने सिल्ली विधानसभा क्षेत्र से झारखंड पार्टी के टिकट पर वर्ष 1952 और 1957 में विधानसभा चुनाव लड़ा। दोनों ही चुनावों में उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवारों को कड़ी चुनौती दी। हालांकि उन्हें मामूली मतों से पराजय का सामना करना पड़ा, लेकिन चुनावी हार कभी उनके उत्साह और संघर्षशील व्यक्तित्व को कमजोर नहीं कर सकी। उनका मानना था कि राजनीति सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और क्षेत्र की सेवा का सशक्त साधन होनी चाहिए।

शिक्षा को मानते थे सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम

प्रो. महतो शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षा के बिना किसी भी समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है। वे विशेष रूप से गरीब परिवारों के बच्चों और लड़कियों की शिक्षा पर जोर देते थे।

वे लोगों को प्रेरित करते हुए कहा करते थे कि सूखी रोटी खाकर और साधारण भोजन करके जीवन गुजारा जा सकता है, लेकिन अपने बच्चों की शिक्षा से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। उनका संदेश था कि परिवार की आर्थिक स्थिति चाहे जैसी हो, बच्चों को अधिक से अधिक शिक्षित बनाना प्रत्येक अभिभावक की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

नारी शिक्षा के प्रति भी उनका दृष्टिकोण अत्यंत प्रगतिशील था। उनका मानना था कि शिक्षित महिलाएं न केवल आत्मनिर्भर बनेंगी, बल्कि परिवार और समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगी।

सिल्ली के विकास में ऐतिहासिक योगदान

सिल्ली प्रखंड प्रमुख के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए अनेक उल्लेखनीय कार्य किये। उन्होंने अपने गांव कांटाडीह तक श्रमदान से सड़क बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। गांव में बिजली पहुंचाने के लिए प्रयास किया तथा किसानों की सिंचाई समस्या के समाधान के लिए लिफ्ट इरिगेशन योजना के माध्यम से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने में योगदान दिया।

क्षेत्र के बेरोजगार युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए भी उन्होंने निरंतर प्रयास किया। तत्कालीन जिला बोर्ड के उपाध्यक्ष पॉल दयाल के सहयोग से सिल्ली क्षेत्र के सैकड़ों युवाओं को शिक्षक के रूप में नौकरी दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

उनकी उदारता और सामाजिक प्रतिबद्धता का एक उदाहरण मुरी स्थित भारत माता अस्पताल के निर्माण के लिए अपनी जमीन दान करना भी है। इससे स्पष्ट होता है कि उनके लिए समाजसेवा केवल भाषणों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे अपने संसाधनों को भी जनहित में लगाने से पीछे नहीं हटते थे।

कुरमाली भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए आजीवन संघर्ष

प्रो. विष्णुचरण महतो का सबसे महत्वपूर्ण योगदान कुरमाली भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में भी रहा। वे कुरमाली भाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की पहचान और सांस्कृतिक विरासत मानते थे।

उन्होंने जीवनभर कुरमाली भाषा के विकास के लिए काम किया। युवाओं को अपनी मातृभाषा के प्रति जागरूक किया तथा कुरमाली साहित्य और लोक परंपराओं पर शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से कई लोगों ने कुरमाली लोक-साहित्य एवं लोक-संस्कृति पर शोध कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

रांची विश्वविद्यालय में कुरमाली भाषा की पढ़ाई प्रारंभ कराने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे चाहते थे कि कुरमाली भाषा को शैक्षणिक और सामाजिक स्तर पर उचित सम्मान मिले तथा आने वाली पीढ़ियां अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व कर सकें।

कुरमी समाज को पुनः अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल कराने के लिए भी उन्होंने जीवनपर्यंत संघर्ष किया। इस विषय पर उनका प्रयास सामाजिक अधिकारों और पहचान की लड़ाई का हिस्सा था।

प्रतिभाओं को पहचानने और आगे बढ़ाने वाले मार्गदर्शक

प्रो. महतो की एक बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपने क्षेत्र के प्रतिभाशाली युवाओं की सफलता को अपनी सफलता मानते थे। वे युवाओं को प्रोत्साहित करते, उनका मार्गदर्शन करते और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

सिल्ली क्षेत्र के जबला गांव निवासी नंदलाल महतो जब बिहार लोक सेवा आयोग की 27वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में उपसमाहर्ता पद के लिए अंतिम रूप से चयनित हुए, तब वे प्रो. महतो से मिलने पहुंचे। नंदलाल महतो उस समय यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में हेड कैशियर के पद पर कार्यरत थे और उनकी पदोन्नति भी होने वाली थी। लेकिन प्रो. महतो ने उन्हें प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि समाज को योग्य और शिक्षित अधिकारियों की आवश्यकता है। उनके प्रोत्साहन से नंदलाल महतो ने बैंक की नौकरी छोड़कर बिहार प्रशासनिक सेवा में योगदान दिया।

इसी प्रकार सोनाहातू प्रखंड के पांडुडीह निवासी डॉ. हलधर महतो मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए रांची कॉलेज में नामांकन लेना चाहते थे। उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी। यह जानकर प्रो. महतो ने उन्हें पत्र लिखकर रांची आने और उनसे मिलने को कहा। उन्होंने आश्वस्त किया कि आर्थिक कठिनाई उनकी पढ़ाई में बाधा नहीं बनने दी जाएगी। जरूरत पड़ने पर वे लोगों से चंदा एकत्र कर उनकी पढ़ाई का खर्च उठायेंगे।

उनका मानना था कि किसी गरीब परिवार की प्रतिभा आर्थिक अभाव के कारण समाप्त नहीं होनी चाहिए। यही सोच उन्हें एक शिक्षक से बढ़कर समाज का सच्चा मार्गदर्शक बनाती थी।

सादगीपूर्ण जीवन और प्रेरणादायी व्यक्तित्व

प्रो. विष्णुचरण महतो का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। वे पद, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से अधिक समाज के हित को महत्व देते थे। उनकी भाषा में सरलता, विचारों में स्पष्टता और व्यवहार में आत्मीयता थी। वे जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति के भेदभाव से ऊपर उठकर लोगों की सहायता करते थे।

उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि जो भी व्यक्ति उनसे मिलता, उनके विचारों और व्यवहार से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। वे शिक्षा, सामाजिक एकता, भाषाई अस्मिता और युवाओं के भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे।

एक दीपक जो दीपावली के दिन बुझ गया

ऐसे महान शिक्षाविद्, समाजसेवी और दूरदर्शी व्यक्तित्व का निधन 1 नवंबर 1986 को दीपावली के दिन एचईसी प्लांट अस्पताल में हो गया। विडंबना देखिए कि जिस दिन पूरा देश दीपावली के अवसर पर दीप जलाकर खुशियां मना रहा था, उसी दिन झारखंड ने अपना एक अनमोल दीपक खो दिया।

आज प्रो. विष्णुचरण महतो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, संघर्ष, सामाजिक योगदान और शिक्षा के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

वास्तव में, किसी व्यक्ति की महानता उसके पद या संपत्ति से नहीं, बल्कि समाज के लिए किये गये कार्यों और लोगों के जीवन में छोड़ी गयी सकारात्मक छाप से आंकी जाती है। इस कसौटी पर प्रो. विष्णुचरण महतो का जीवन एक आदर्श उदाहरण है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव स्मरणीय रहेगा। विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।

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