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महर्षि वाल्मीकि जयंती 26 अक्टूबर को

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महर्षि वाल्मीकि जयंती 26 अक्टूबर को
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रामायण के माध्यम से विश्व को दिया सत्य, धर्म और मर्यादा का संदेश : संजय सर्राफ 

टीम एबीएन, रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति और साहित्यिक परंपरा में महर्षि वाल्मीकि का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण है। संस्कृत साहित्य के आदिकवि एवं महाकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि की जयंती प्रतिवर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनायी जाती है। इस वर्ष बाल्मीकि जयंती 26 अक्टूबर दिन सोमवार को मनाया जायेगा। 

इस अवसर पर देशभर में पूजा-अर्चना, रामायण पाठ, भजन-कीर्तन, शोभायात्राओं तथा सामाजिक सेवा के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना कर भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, माता सीता के त्याग, भ्रातृप्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और धर्मपालन की महिमा को जन-जन तक पहुंचाया। रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, पारिवारिक मर्यादा और आदर्श जीवन का अनुपम मार्गदर्शक भी है। 

इसकी शिक्षाएं आज भी समाज को सत्य, न्याय, करुणा और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का पूर्व नाम रत्नाकर था। कहा जाता है कि वे प्रारंभ में लूटपाट करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। एक दिन उनकी भेंट देवर्षि नारद से हुई। नारद जी ने उनसे पूछा कि जिन परिजनों के लिए वे पापकर्म कर रहे हैं, क्या वे भी उनके पापों में भागीदार बनेंगे? 

इस प्रश्न ने रत्नाकर को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया। अपने कर्मों का बोध होने पर उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया। दीर्घकालीन साधना के दौरान उनके चारों ओर दीमकों ने बाँबी बना ली। संस्कृत में बांबी को वाल्मीकि कहा जाता है, इसी कारण वे महर्षि वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए। महर्षि वाल्मीकि की जीवनगाथा आत्मपरिवर्तन, ज्ञान, तपस्या और सदाचार की अनुपम प्रेरणा देती है। 

परंपरागत मान्यता के अनुसार, माता सीता ने उनके आश्रम में आश्रय लिया था, जहां लव-कुश का जन्म हुआ और महर्षि ने उन्हें शिक्षा प्रदान की। यह जयंती हमें संदेश देती है कि मनुष्य अपने विचारों और कर्मों में परिवर्तन लाकर महानता प्राप्त कर सकता है। सामाजिक समरसता,शिक्षा, मानवता और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना इस पर्व का प्रमुख उद्देश्य है। महर्षि वाल्मीकि के आदर्शों को अपनाकर ही हम एक सुसंस्कृत, सद्भावपूर्ण और आदर्श समाज के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।

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