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रांची के दुर्गा पूजा पंडाल में दिशुम वीर बाबू देवेन्द्र नाथ महतो की प्रतिमा बनी आकर्षण का केंद्र

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रांची के दुर्गा पूजा पंडाल में दिशुम वीर बाबू देवेन्द्र नाथ महतो की प्रतिमा बनी आकर्षण का केंद्र
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  • देवेंद्र नाथ महतो को समाज के प्रति समर्पण,  और निडरता के साथ अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है 
  • झारखंड के छात्र आंदोलन को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाले देवेन्द्र नाथ महतो दिशुम वीर बाबू, युवा आइकॉन, सोशल रिफॉर्मर, अनशनकर्ता, झारखंड के सोनम वांगचुक, छात्र आंदोलनकारी के नाम से प्रसिद्ध है
  • नामकुम के जय माता दी क्लब की अनूठी पहल, माता-पिता के सम्मान, संस्कार और संघर्ष का संदेश दे रहा पूजा पंडाल 

टीम एबीएन, रांची। राजधानी रांची के नामकुम रेलवे स्टेशन के समीप स्थित जय माता दी क्लब का दुर्गा पूजा पंडाल इस वर्ष विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। राजस्थान के प्रसिद्ध हवा महल की तर्ज पर निर्मित भव्य पंडाल में मां दुर्गा के दर्शन के साथ सामाजिक, पारिवारिक और मानवीय मूल्यों को भी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। पंडाल परिसर में स्थापित आठ प्रतिमाओं के माध्यम से माता-पिता के सम्मान, माँ की ममता, बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और संस्कारों को दर्शाया गया है।

इन प्रतिमाओं के बीच झारखंड के चर्चित छात्र आंदोलनकारी नेता, जेएलकेएम के केंद्रीय वरीय उपाध्यक्ष, सोशल रिफॉर्मर, युवा आइकॉन, अनशनकर्ता, दिशुम वीर बाबू देवेन्द्र नाथ महतो की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। उनकी प्रतिमा को देखने के लिए लोग भारी संख्या में उत्सुकता के साथ पूजा पंडाल पहुंच रहे हैं और प्रतिमाओं के माध्यम से प्रस्तुत सामाजिक संदेशों को समझ रहे हैं। एक ओर मां दुर्गा की आराधना हो रही है, तो दूसरी ओर समाज के प्रति समर्पण, जनसेवा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी दी जा रही है। 

छात्र आंदोलन से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर 

देवेन्द्र नाथ महतो झारखंड में छात्र हितों, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और युवाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले प्रमुख चेहरा हैं। जेपीएसससी जेएसएससी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और अभ्यर्थियों को न्याय दिलाने की मांग को लेकर उनके नेतृत्व में चला आंदोलन व्यापक चर्चा में रहा। 
लगातार संघर्ष करते हुए उन्होंने 26 दिनों तक सत्याग्रह, 16 दिनों तक भूख हड़ताल तथा 24 जिलों में भर्ती व्यवस्था सुधार यात्रा किया। 

इस आंदोलन की खास विशेषता शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठाने पर विशेष जोर दिया गया। इस आंदोलन को भारी संख्या में देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों ने भारी संख्या में समर्थन दिया, उनके समर्थक उन्हें स्नेहपूर्वक दिशुम वीर बाबू और झारखंड के सोनम वांगचुक अनशनकर्ता, सोशल रिफॉर्मर, युवा आइकॉन, छात्र आंदोलनकारी के नाम से संबोधित करते हैं। 

छात्रों के साथ-साथ वे मजदूरों के वेतन, बोनस और कार्यस्थल पर अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी आवाज उठाते रहे हैं। जनसमस्याओं को लेकर संबंधित पक्षों से संवाद करना और समाधान के लिए प्रयास करना उनकी सार्वजनिक गतिविधियों का हिस्सा रहा है। देवेन्द्र नाथ महतो की संघर्ष की प्रमुख विशेषता यह रहती है कि वे जन समस्याओं को केवल बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय संघर्ष तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। नामकुम के पूजा पंडाल में देवेंद्र नाथ महतो का प्रतिमा स्थापित होना उनकी सार्वजनिक पहचान और संघर्ष की यात्रा को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।  

एक ही परिसर में संस्कार से संघर्ष तक का संदेश 

जय माता दी क्लब के अध्यक्ष विनोद सिंह ने अपने माता-पिता रामा देवी और कैलास सिंह की प्रतिमाएं स्थापित कर माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का संदेश दिया है। वहीं, देवेन्द्र नाथ महतो की प्रतिमा संघर्ष, समर्पण और जनसेवा की भावना को दर्शाती है। इसके माध्यम से यह संदेश उभरता है कि परिवार से मिलने वाले संस्कार व्यक्ति को समाज के प्रति जिम्मेदार बना सकते हैं और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा दे सकते हैं। 

रांची के गलियारों में में चर्चा है कि नामकुम रेलवे स्टेशन के समीप स्थित जय माता दी क्लब का यह पूजा पंडाल धार्मिक आस्था के साथ साथ सामाजिक सरोकारों को जोड़ने का प्रयास कर रहा है। देवेंद्र नाथ महतो की प्रतिमा इस वर्ष लोगों के बीच विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है। माता- पिता के सम्मान से लेकर जनहित के लिए संघर्ष तक की यात्रा को एक ही परिसर में प्रस्तुत करने वाला यह प्रयास दुर्गा पूजा को सामाजिक संदेश से जोड़ने की एक उल्लेखनीय पहल है। 

यह पूजा पंडाल केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि समाज को परिवार, संस्कार, शिक्षा और जनहित के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देने का भी प्रयास है। दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर देवेन्द्र नाथ महतो की प्रतिमा का आकर्षण लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। यह पहल दशार्ती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन सामाजिक सरोकारों तथा जनसेवा की प्रेरणा का माध्यम भी बन सकते हैं।

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