अनाथालय के नाम पर हजारीबाग में भीख मांगने का धंधा, त्योहार आते ही सक्रिय होते हैं गिरोह
एबीएन न्यूज नेटवर्क, हजारीबाग। धर्म और इंसानियत के नाम पर अगर आपकी जेब से निकला पैसा किसी अनाथ बच्चे के भविष्य को संवारने के बजाय जालसाजों की तिजोरी में पहुंच रहा हो, तो यह सिर्फ धोखाधड़ी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं पर करारा प्रहार है। हजारीबाग में अनाथालय और गरीब बच्चों की मदद के नाम पर चंदा वसूलने की गतिविधियां गंभीर सवाल खड़े करती हैं। खासकर दुगार्पूजा, दीपावली और छठ जैसे पावन पर्वों के दौरान ऐसे लोगों की सक्रियता पर निगरानी जरूरी हो जाती है।
त्योहारों में आस्था को बनाया जाता है हथियार
त्योहारों के समय बाजारों, चौक-चौराहों और रिहायशी इलाकों में कुछ लोग अनाथालय, वृद्धाश्रम, गौशाला अथवा जरूरतमंद बच्चों की सहायता के नाम पर लोगों से पैसे मांगते नजर आते हैं। हाथों में रसीद बुक, पर्चे या संस्थान के नाम वाले कागजात लेकर ये लोग लोगों की धार्मिक भावना और दया का लाभ उठाने की कोशिश कर सकते हैं। सवाल यह है कि आखिर जुटायी गयी रकम वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचती भी है या नहीं?
फर्जीवाड़े की आशंका, सत्यापन जरूरी
यदि किसी संस्था का पंजीकरण, उसका वास्तविक पता, बच्चों की संख्या और चंदे के उपयोग का विवरण स्पष्ट नहीं है, तो उसकी विश्वसनीयता की जांच करना आवश्यक है। कुछ मामलों में फर्जी रसीदों और भ्रामक पहचान के जरिए चंदा वसूली की शिकायतें सामने आती रही हैं। हालांकि, हजारीबाग में किसी संगठित गिरोह के सक्रिय होने या बच्चों को भीख मंगवाने के लिए इस्तेमाल करने की पुष्टि जांच के बाद ही की जा सकती है।
प्रशासन की निगरानी और जनता की सतर्कता जरूरी
आम नागरिक चंदा देने से पहले संस्था का पंजीकरण, अधिकृत पहचान और आधिकारिक संपर्क विवरण जांचें। संदिग्ध गतिविधि दिखने पर पुलिस या संबंधित बाल संरक्षण अधिकारियों को सूचना दें।
अब सवाल व्यवस्था से है
क्या त्योहारों की भीड़ में आस्था के नाम पर होने वाली कथित वसूली की जांच होगी? जरूरतमंदों की मदद करना पुण्य है, लेकिन बिना सत्यापन पैसा देना जालसाजी को बढ़ावा भी दे सकता है। प्रशासन को चाहिए कि शिकायतों की जांच करे, दोषियों पर कार्रवाई करे और वास्तविक जरूरतमंद बच्चों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे।