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पलामू : कंबल के सहारे इलाज की उम्मीद, तो फिर दो बार का जनप्रतिनिधित्व और सूर्या की उच्च शिक्षा किस काम?

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पलामू : कंबल के सहारे इलाज की उम्मीद, तो फिर दो बार का जनप्रतिनिधित्व और सूर्या की उच्च शिक्षा किस काम?
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  • कंबल के सहारे इलाज की उम्मीद, तो फिर दो बार का जनप्रतिनिधित्व और सूर्या की उच्च शिक्षा किस काम? 

उदय प्रकाश ओझा

एबीएन न्यूज नेटवर्क, हुसैनाबाद, पलामू। हुसैनाबाद का अनुमंडल मैदान इन दिनों चर्चा में है। एक से आठ अक्टूबर तक काली कंबल वाले बाबा के सानिध्य में निःशुल्क आरोग्य शिविर चल रहा है। उपलब्ध समाचारों के अनुसार इसका आयोजन पूर्व मंत्री सह पूर्व विधायक कमलेश कुमार सिंह के सौजन्य से और युवा नेता सूर्या सिंह के नेतृत्व में किया जा रहा है।

शिविर में मरीजों की भीड़ है। कोई बीमारी लेकर पहुंच रहा है तो कोई उम्मीद लेकर। आयोजकों की ओर से इसे सेवा और स्वास्थ्य सुविधा से जोड़ा जा रहा है। लेकिन भीड़ के बीच एक सवाल भी खड़ा है—क्या यह केवल स्वास्थ्य शिविर है या राजनीति के मैदान में जनसंपर्क का एक नया अध्याय भी?इस आयोजन को आगामी विधानसभा राजनीति की तैयारी और जनसंपर्क के नजरिये से देखा जा रहा है। 

चूंकि इसी मंच से अब हुसैनाबाद को जिला बनाने की घोषणा की जा रही है।हालांकि इसका अंतिम राजनीतिक अर्थ जनता और समय ही तय करेगा। लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है कि जिस हुसैनाबाद को कमलेश कुमार सिंह ने दो बार विधानसभा में प्रतिनिधित्व दिया, उसी हुसैनाबाद में आज लोगों को इलाज के लिए कंबल वाले बाबा के शिविर की ओर उम्मीद से देखना पड़ रहा है—तो फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल क्यों न उठे? 

कमलेश सिंह 2005 और 2019 में हुसैनाबाद से विधायक निर्वाचित हुए थे और अलग-अलग सरकारों में मंत्री भी रहे।राजनीति में उनकी भूमिका भी ऐसी रही कि झारखंड की बदलती सरकारों के दौर में वे सत्ता के समीकरणों के महत्वपूर्ण किरदारों में रहे। 2005 के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम में उनकी भूमिका और मधु कोड़ा सरकार में मंत्री पद का उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में शुमार है।

ऐसे में सवाल पूछना गलत नहीं होगा कि जब सत्ता में रहने का अवसर मिला, जब मंत्री पद मिला, जब क्षेत्र का प्रतिनिधित्व मिला, तब हुसैनाबाद की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को इतना मजबूत क्यों नहीं किया जा सका कि मरीजों को इलाज के लिए चमत्कार, झाड़-फूंक या किसी वैकल्पिक दावे पर निर्भर होने की जरूरत ही न पड़े? और एक दूसरा सवाल भी स्वाभाविक है कि यदि नई पीढ़ी आधुनिक शिक्षा और उच्च शिक्षा की बात करती है, तो स्वास्थ्य के मामले में वैज्ञानिक चिकित्सा, जांच और प्रमाणित उपचार को ही प्राथमिक आधार बनाने की जरूरत पर जोर क्यों नहीं दिया जाता?

यह सवाल किसी की आस्था के खिलाफ नहीं है। आस्था अपनी जगह है और चिकित्सा विज्ञान अपनी जगह। कंबल से किसी बीमारी के उपचार का दावा सही है या नहीं—इसका फैसला न भीड़ कर सकती है, न राजनीति और न सोशल मीडिया। इसका मूल्यांकन वैज्ञानिक प्रमाण, चिकित्सकीय जांच और प्रमाणित चिकित्सा पद्धति के आधार पर ही होना चाहिए।

किंतु विडंबना देखिए—जिस दौर में दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक सर्जरी और आधुनिक चिकित्सा तकनीक की ओर बढ़ रही है। उसी समय हुसैनाबाद में मरीज इलाज के लिए कंबल की ओर उम्मीद से देख रहे हैं।तो सवाल बाबा से कम और व्यवस्था से ज्यादा है।अगर सरकारी अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर हों, जांच की सुविधा हो, जरूरी दवाएं उपलब्ध हों और गंभीर मरीजों को समय पर बेहतर इलाज मिले, तो किसी भी मरीज को बीमारी के इलाज के लिए चमत्कार की तलाश क्यों करनी पड़े?

और अगर वर्षों तक सत्ता और जनप्रतिनिधित्व का अनुभव रखने वाले नेता आज स्वास्थ्य शिविर लगाकर लोगों की सेवा कर रहे हैं, तो यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। लेकिन जनता यह सवाल पूछने के लिए भी स्वतंत्र है कि जब आप सत्ता में थे, तब स्थायी स्वास्थ्य व्यवस्था क्यों नहीं बनाई? और आज शिविर लगाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? चूंकि कंबल कुछ दिनों का शिविर दे सकता है, लेकिन अस्पताल की जरूरत रोज होती है।

हुसैनाबाद की जनता को भीड़ नहीं, भरोसेमंद स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए। उसे चमत्कार की उम्मीद नहीं, इलाज की गारंटी देने वाली व्यवस्था चाहिए। बाकी कंबल आएगा, शिविर लगेगा, भीड़ जुटेगी और कार्यक्रम खत्म हो जाएगा।लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था का सवाल वहीं रहेगा कि आखिर हुसैनाबाद के मरीज कब तक इलाज के साथ उम्मीद भी ढोते रहेंगे?

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