एबीएन न्यूज नेटवर्क, चौपारण (हजारीबाग)। प्रखंड के शहीद भगत सिंह 10 + 2 विद्यालय झापा बिसनपुर में शहीद ए आजम भगत सिंह की जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान बच्चों की रंगारंग प्रस्तुतियों ने उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। मौके पर मुख्य अतिथि विद्यालय के संस्थापक सचिव सह बरही विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक रामलखन सिंह, विद्यालय के अध्यक्ष सेवानिवृत्त शिक्षक बीरेंद्र सिंह, विद्यालय के प्राचार्य महादेव प्रजापति समेत कई गणमान्य और विद्यालय के शिक्षक, अभिभावक व विद्यार्थी उपस्थित थे।
इस दौरान मुख्य अतिथि ने कहा कि भगत सिंह ने कम उम्र में जो कर दिखाया, वो आज के हालात में संभव नहीं है। उन्होंने देश को आजादी दिलाने में जो भूमिका निभायी, आज हम उसका लाभ ले रहे हैं। लेकिन आज के राजनेताओं की करतूतों ने हमें शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज देश की गतिविधियां ट्रंप समेत विदेशी राजनयिकों के अधीन है। हमारे देश के मुखिया उनके सामने नतमस्तक हैं। देश की सारी संपत्तियां अंबानी-अडाणी के पास गिरवी है। ऐसे में देश की आजादी को खतरा है। आज भगत सिंह समेत आजादी के सभी नायकों की आत्मा ऐसे राजनेताओं की करतूतों पर कुहक रही होगी।
मैं नहीं चाहता कि लोग कहें- भगत सिंह की मां रो रही है
उन्होंने कहा कि आज ही के दिन यानी 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह और उनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरू को फांसी दी थी। फांसी 24 मार्च 1931 की सुबह दी जानी थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार को माहौल बिगड़ने का डर था, इसलिए नियमों को दरकिनार कर एक रात पहले ही तीनों क्रांतिकारियों को चुपचाप लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया।
कहा जाता है कि भगत सिंह ने अपनी मां विद्यावती से कहा था, मेरा शव लेने आप नहीं आना और कुलबीर (छोटा भाई) को भेज देना, क्योंकि यदि आप आएंगी तो रो पड़ेंगी और मैं नहीं चाहता कि लोग यह कहें कि भगत सिंह की मां रो रही है। फांसी से पहले 22 मार्च 1931 को भगत सिंह ने अपने साथियों को एक पत्र भी लिखा था जिससे पता चलता है कि देश की आजादी के लिए वह अपनी कुर्बानी देने को कितना उत्सुक थे। आखिरी खत में उन्होंने लिखा था- मुझे फांसी होने के बाद देश की खातिर कुर्बानी देने वालों की तादाद बढ़ जायेगी।
ठहरो! पहले एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल तो ले
फांसी पर जाने से पहले भगत सिंह लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहे थे। जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनकी फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिए! पहले एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद ही किताब छोड़ कर बोले- ठीक है अब चलो। भगत सिंह जेल में भूख हड़ताल के दौरान इतने प्रसिद्ध हो गये थे कि 30 जून 1929 को पूरे देश में भगत सिंह दिवस मनाया गया था।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह की फांसी की सजा पर अंतिम मुहर 14 फरवरी, 1931 को लगी थी। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय ने वॉयसराय लॉर्ड इरविन के समक्ष दया याचिका लगाई थी जिसे इस दिन खारिज कर दिया गया था। भगत सिंह पर अंग्रेज पुलिस अधिकारी जेपी सॉन्डर्स की हत्या का आरोप था। मुकदमे की सुनवाई 5 मई 1930 को शुरू हुई थी। 7 अक्तूबर 1930 को तीनों देशभक्तों को फांसी की सजा सुनायी गयी और 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गयी।
ब्रिटिश सरकार की बर्बरता
ब्रिटिश सरकार ने फांसी के बाद उनके शवों को परिवार को सौंपने के बजाय शवों के टुकड़े-टुकड़े करवाकर सतलुज नदी के किनारे स्थित हुसैनीवाला के पास जलवाने की कोशिश की थी। उसी दौरान वहां लाला लाजपत राय की बेटी पार्वती देवी और भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर सहित हजारों की संख्या में लोग पहुंच गए।
इससे वहां मौजूद अंग्रेज पुलिसकर्मी शवों को अधजला छोड़कर भाग गए। लोगों ने तीनों शहीदों के अधजले शवों को आग से निकाला और फिर उन्हें लाहौर ले जाया गया, जहां 24 मार्च की शाम हजारों की भीड़ ने पूरे सम्मान के साथ उनकी शव यात्रा निकाली। उनका अंतिम संस्कार रावी नदी के किनारे उस जगह के पास किया गया जहां लाला लाजपत राय का अंतिम संस्कार हुआ था।
एफआईआर में नाम ही नहीं!
भगत सिंह को जिस केस में फांसी की सजा सुनाई गई थी, उस केस में दर्ज एफआईआर में उनके नाम का उल्लेख नहीं मिलने का दावा भी किया गया है। दरअसल, अदालत के आदेश पर जब लाहौर पुलिस ने अनारकली थाने के रिकॉर्ड की गहन छानबीन की तो उसे 1928 में सॉन्डर्स की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर में भगत सिंह के नाम का उल्लेख नहीं मिला।
मामले का खुलासा भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज राशिद कुरैशी की याचिका से हुआ, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के खिलाफ सॉन्डर्स की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर की सत्यापित प्रति मांगी गई थी। सॉन्डर्स की हत्या भूलवश हो गई थी। भगत सिंह और उनके साथी लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने बड़े अंग्रेज पुलिस अधिकारी स्कॉट को मारने की योजना बनाई थी, लेकिन वह उसे पहचानते नहीं थे, लिहाजा उसकी जगह सॉन्डर्स मारा गया।
असेंबली में बम फेंक अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था
भगत सिंह ब्रिटिश सरकार की मजदूर विरोधी नीति से नाराज थे और इसे सेंट्रल असेंबली में पारित नहीं होने देना चाहते थे। सरकार को चेतावनी देने और उस तक अपनी आवाज पहुंचाने के मकसद से ही उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। दोनों ने इस बात का ख्याल रखा कि घटना में कोई घायल न हो, लिहाजा बम खाली जगह फेंका गया।
पूरा हाल धुएं से भर गया था। भगत सिंह चाहते तो भाग सकते थे, पर उन्होंने खुद को गिरफ्तार करवाना बेहतर समझा। बम फटने के बाद उन्होंने इंकलाब जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद मुदार्बाद के नारे भी लगाए और अपने साथ लाए हुए पर्चे हवा में उछाल दिए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।
13 और 23 का था अलग महत्व
शहीद-ए-आजम का नाम भागां वाला (किस्मत वाला) होने के कारण भगत सिंह पड़ा। उन्हें यह नाम उनकी दादी जयकौर ने दिया था, क्योंकि जिस दिन उनका जन्म हुआ, उसी दिन उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह जेल से छूट कर आए थे। भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब प्रांत के ल्यालपुर जिले के बांगा गांव में हुआ था।
करतार सिंह सराबा को अपना आदर्श मानने वाले भगत सिंह की जिंदगी में 13 और 23 तारीख का बड़ा महत्व रहा। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहार ने उन्हें क्रांतिकारी बनाने का काम किया। उनके परिवार के सदस्यों के मुताबिक भगत सिंह द्वारा लिखे गये ज्यादातर पत्रों पर 13 या 23 तारीख अंकित हैं। 23 मार्च को 23 साल की उम्र में ही वह देश की खातिर फांसी के फंदे पर झूल गये।