टीम एबीएन, रांची। आजादी के अमृत महोत्सव कार्यक्रम में आज डीएवी बरियातू में सभी शिक्षकों और आॅनलाइन जुड़े सैकड़ों विद्यार्थियों व अभिभावकों को संबोधित करते हुए आचार्य मुक्तरथ जी ने कहा कि भारत में उपनयन संस्कार की प्रथा बहुत प्राचीन है। उपनयन आज्ञा चक्र को जागृत करने की विधा है। जब बच्चों का कम उम्र में उपनयन होता था, तो उन्हें सूर्यनमस्कार और प्राणायाम की शिक्षा दी जाती थी। जिससे मस्तिष्क में पिनियल ग्रंथि के श्राव को अधिक उम्र तक बरकरार रखा जा सके। उसके सेक्रिएसन को रोका जा सके। यह उपनयन का वैज्ञानिक रहस्य है। पीनियल ग्रंथि दस से बारह वर्ष तक ही कार्यशील रहता है और जब तक यह ग्रंथि कार्यशील रहती है, तब तक बच्चों में असीमित ऊर्जा रहती है। उसमें भय नहीं होता है, उसमें हिचक नहीं होती है। उसका याददाश्त बहुत तेज होता है, उसमें एकाग्रता धारण करने की क्षमता बहुत रहती है। लेकिन जैसे-जैसे पिनियल ग्रंथि का ह्रास होता जाता है, इन सभी क्षमताओं में कमी आने लगती है। इसी क्षय को रोकने के लिए हिंदुस्तान में उपनयन संस्कार की विधा आज भी जाग्रत है। पर बहुत कम। आज डीएवी बरियातू में स्वामी मुक्तरथ और अवनीश कुमार तथा रजनीश के निर्देशन में बड़ी संख्या में शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक सूर्यनमस्कार के अभ्यासों को किया। इसके साथ ही डीएवी हेहल, डीएवी नीरजा सहाय, डीएवी पुंदाग और डीएवी गांधीनगर के शिक्षक और हजारों की संख्या में विद्यार्थी एवं अभिभावक ने सूर्यनमस्कार का अभ्यास किया। आज सत्यानंद योग मिशन का 51,000 सूर्यनमस्कार का लक्ष्य पूरा हुआ। कार्यक्रम को सफल बनाने में डीएवी के क्षेत्रीय निदेशक पश्चिमी एमके सिन्हा, निदेशक पूर्वी एसके सिन्हा, बरियातू डीएवी के प्राचार्य विनय पांडे, नीरजा सहाय डीएवी के प्राचार्य टीके मिश्रा और एसआर डीएवी पुंदाग के प्राचार्य एसके मिश्रा का बहुत बड़ा सहयोग मिला।