टीम एबीएन, रांची। आज पर्युषण पर्व के छठे दिन जैन मंदिर डोरंडा में भगवान महावीर के जीवनी के बारे मे वान्चन किया गया। मंदिर में भक्ति भाव से सुबह 7:30 बजे स्नात्र पूजा संपन्न हुई। तत्पश्चात मुंबई से पधारें साधर्मी बंधु श्री धैर्य पियूष भाई एवं तीर्थ धर्मवीर शाह जी के द्वारा प्रवचन किया गया। आज पर्युषण महापर्व के छठे दिन आज के प्रवचन में श्री कल्पसूत्र के माध्यम से भगवान महावीर स्वामी की दीक्षा, कठोर साधना और उपसर्गों को समता भाव से सहन करने का वर्णन किया गया।
आज का प्रवचन सार जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जीवनी पर था। उन्होंने दीक्षा (संयम पथ) 30 वर्ष की आयु में राजपाठ और मोह-माया का त्याग कर दीक्षा अंगीकार की और श्रमण जीवन को अपनाया था। दीक्षा लेने के बाद भगवान महावीर ने लगभग 12 वर्षों तक निरंतर अनशन, मौन, ध्यान और अत्यंत कठोर तपस्या की, साधना काल के दौरान भगवान को अनेक प्रकार के परीषह और उपसर्ग (कष्ट व अपमान) मिले, जिन्हें उन्होंने पूर्ण समता भाव और अडिग शांति के साथ सहन किया।
भगवान महावीर ने कई जीवों का कल्याण किया जिनमे से एक अत्यंत क्रोधी, विशाल एवं भयंकर जहरीले चंडकौशिक सर्प को भी क्षमा करते हुए उसके सर्प योनि से भव भव की नैया से भी पार लगा दिया। केवलज्ञान प्राप्ति: इस लंबी और कठोर साधना के फलस्वरूप उन्हें परम शुद्ध केवलज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई।
आत्मा की आंतरिक शुद्धि, संयम के पालन, शांति, क्षमा भाव ये भगवान महावीर के आचरण थे, जिनसे हमें अपने जीवन मे प्रेरणा लेने के बारे मे बताया गया साथ ही प्रवचन में भगवान महावीर के त्याग, तप और संयमपूर्ण जीवन से प्रेरणा लेते हुए आत्मचिंतन एवं आत्मशुद्धि का संदेश दिया गया। शाम में धार्मिक अंताक्षरी का आयोजन किया गया एवं भक्ति संध्या हुई।
आज के कार्यक्रम में लोगो में दिनेश सेठ, सुरेश बोथरा, अक्षय सेठिया, विनोद भंडारी, विनय नाहटा,संतोष बेगानी, सुशीला सेठिया, सोनल नाहटा, संजय कोठारी, श्रुति, गरिमा, खुशबू, मयंक आदि उपस्थित हुए। उक्त जानकारी प्रमोद बोथरा ने दी।