टीम एबीएन, रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता चेतना, राष्ट्रीय स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में इस गीत ने करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाने और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष का साहस पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
ऐसे राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़े गीत का अनावश्यक विरोध निश्चित रूप से उचित नहीं माना जा सकता। वंदे मातरम् के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय थे। उनके उपन्यास आनंदमठ में यह गीत प्रकाशित हुआ था। बाद में यह स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रेरणास्रोत बना। महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के दौर में वंदे मातरम् देशवासियों के लिए संघर्ष और एकता का उद्घोष बन गया।
संविधान सभा ने भी 24 जनवरी 1950 को वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान प्रदान किया। भारत विविधताओं का देश है, जहां अलग-अलग धर्म, भाषा, संस्कृति और परंपराओं के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं। इसलिए राष्ट्रभक्ति का अर्थ किसी धर्म या समुदाय विशेष से जोड़ना नहीं, बल्कि संविधान, तिरंगे, मातृभूमि और देश की एकता-अखंडता के प्रति सम्मान रखना है। इसी भावना से वंदे मातरम् को भी देखा जाना चाहिए।
किसी व्यक्ति को किसी गीत के प्रति अपनी व्यक्तिगत मान्यता या असहमति रखने का अधिकार हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़े प्रतीकों का सार्वजनिक रूप से अपमान या अनावश्यक विरोध सामाजिक सद्भाव के लिए उचित नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम मतभेदों को संवाद के माध्यम से सुलझाएं और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।
आज जब देश विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब हमें ऐसे प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए जो स्वतंत्रता संघर्ष की याद दिलाते हैं। वंदे मातरम् का सम्मान किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता चेतना और राष्ट्रीय गौरव का सम्मान है।