- आदिवासी संस्कृति हमारी पहचान, प्रकृति पूजा ही सच्चा धर्म : सांसद सुखदेव भगत
- विश्व आदिवासी दिवस पर बोले- जल-जंगल-जमीन की रक्षा और भाषा-संस्कृति को बचाना हर आदिवासी का संकल्प
एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर लोहरदगा लोकसभा के सांसद सुखदेव भगत ने आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपरा, भाषा और प्रकृति आधारित जीवनशैली को संरक्षित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी संस्कृति महज परंपराओं का संग्रह नहीं, बल्कि देश की प्राचीन सभ्यता, जीवन-दर्शन और पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
सांसद सुखदेव भगत ने कहा कि हम आदिवासी प्रकृति के पुजारी हैं। जल, जंगल और जमीन हमारी पहचान है और अपनी संस्कृति पर हमें गर्व है। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से जूझ रही है। ऐसे समय में प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की आदिवासी जीवन-पद्धति पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का उदाहरण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा, पूजा-पद्धति और सामाजिक विरासत को हर हाल में सुरक्षित रखना होगा। यह केवल किसी एक व्यक्ति या संगठन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सामूहिक दायित्व है। यदि अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत को भुला दिया गया तो समाज की पहचान कमजोर हो जाएगी।
श्री भगत ने कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आदिवासी समाज के पूर्वजों ने लंबा संघर्ष किया और अनेक कुर्बानियां दीं। अबुआ राज का सपना भी इसी स्वाभिमान, अधिकार और आत्मनिर्णय की भावना से जुड़ा रहा है। आज जरूरत है कि उनके संघर्ष और बलिदान को याद करते हुए उनके सपनों को साकार करने के लिए एकजुट होकर काम किया जाए।
सांसद ने कहा कि संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को जागरूक और संगठित रहना होगा। उन्होंने विश्व आदिवासी दिवस पर सभी आदिवासी समाज के लोगों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि अपनी संस्कृति और प्रकृति की रक्षा ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।