एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। आजसू पार्टी के केंद्रीय सचिव सूरज अग्रवाल ने झारखंड की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि आज जंतर मंतर से लेकर झारखंड के मोराबादी मैदान तक शिक्षित बेरोजगार युवा अपने और अपने परिवार के भविष्य को लेकर आंदोलन कर रहे हैं और झारखंड के भ्रष्टाचारियों कर्मचारी नेता करोड़ों रुपये का उगाही कर चैन की नींद सो रहे हैं। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। एक ओर शिक्षित युवा चिंतन मंथन कर रहे हैं और दूसरी ओर जितने भी सरकारी स्कूल है वहां पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय (कक्षा 1 से 5 तक) में प्रति 30 बच्चे के ऊपर एक शिक्षक या शिक्षिका होना चाहिए और उच्च विद्यालय में (कक्षा 6 से 10 तक) 35 बच्चों के ऊपर एक शिक्षक या शिक्षिका होना चाहिए। लेकिन पूरे झारखंड का सर्वे करा लिया जाए, यह व्यवस्था आज तक लागू नहीं हुई है। कुछ शिक्षक विद्यालय में पढ़ाई कम और नेतागिरी करने में ज्यादा व्यस्त है। जैसे लगता है उन्हें भविष्य में विधायक या सांसद का चुनाव लड़ना हो।
वह अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाएंगे, परंतु जिस विद्यालय की जिम्मेवारी इन्हें सौपी गयी है उस विद्यालय का भविष्य खराब किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था तो खराब है ही, लेकिन शहरी क्षेत्र में कुछ शिक्षक शिक्षिका को छोड़कर अधिकतम शिक्षक अपने कर्तव्यों का सही से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। कई शिक्षक-शिक्षिका सरकारी तंत्र में मोटा चढ़ावा चढ़ाकर शहर के विद्यालयों में डिप्टेशन में रहकर शिक्षा व्यवस्था संभाल रहे हैं।
जबकि अगर यह ईमानदार शिक्षक शिक्षिका है, तो इन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर स्वच्छ शिक्षा का माहौल बनाना चाहिए था। शिक्षा विभाग के कई अधिकारी विद्यालयों में जांच करने जाते हैं और जांच के नाम पर हजारों लाखों उगाही करके अपने कार्यालय में लौट जाते हैं। सभी विद्यालयों का आॅडिट कराया जाता है। आॅडिट के नाम पर भी झोल-झाल किया जाता है। क्या कभी ऐसा हो सकता है कि झारखंड के हजारों विद्यालय में कोई गलतियां हुआ ही ना हो? लेकिन आॅडिट करने वाले अधिकारी पैसे के दम पर सरकारी विद्यालयों को क्लीन चिट देते हैं।
अब जरा आप ही सोचिए कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? आज इसी सरकारी शिक्षा व्यवस्था के कारण दो दशकों से प्राइवेट स्कूलों का बोलबाला बढ़ा है। बात कड़वा है लेकिन सच है। आज विद्यालय में गरीब आदिवासी मूलवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए एक योजना लाया गया था मध्याह्न भोजन, ताकि गरीब का बच्चा कम से कम भोजन के नाम पर विद्यालय आवे और शिक्षा प्राप्त करे। लेकिन सरकारी तंत्र एवं शिक्षकों की लापरवाही के कारण यह व्यवस्था भी धराशाई हो चुकी है।
आज विद्यालय में मुफ्त सुविधा के नाम पर मध्याह्न भोजन, साइकिल वितरण, ड्रेस वितरण, जूता मौज वितरण, बैग वितरण, कॉपी किताब वितरण आदि कई व्यवस्था मे टैक्स भरने वाले लोगों का करोड़ों रुपये लग रही है। लेकिन क्या सरकार इन विद्यालयों में उच्च शिक्षा स्वच्छ शिक्षा दे पा रही है। यह सरकार को खुद अपने आप में सोचना चाहिए एक नारा दिया गया था (पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया) तो क्या हम सभी अच्छी शिक्षा व्यवस्था बहाल कर पा रहे हैं। यह आज के शिक्षक और शिक्षिका को चिंतन और आत्म मंथन करने की आवश्यकता है कि हम देश के भविष्य को बढ़ा रहे हैं या बर्बाद कर रहे हैं।