- आदिवासियों की अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं, वनवासी शब्द का हम पुरजोर विरोध करते हैं : सुखदेव भगत
- आदिवासी शब्द केवल नाम नहीं है, बल्कि देश की सांस्कृतिक विविधता सह अस्तित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है : सांसद
एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। आगामी 24 मई को आरएसएस और भाजपा द्वारा दिल्ली में आयोजित प्रस्तावित जनजातीय समागम को लेकर झारखंड की राजनीति गरमा गई है।
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के द्वारा आज कांग्रेस मुख्यालय मेंकांग्रेस नेताओं ने संयुक्त प्रेस वार्ता कर इस आयोजन को आदिवासियों की पहचान, संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत पर हमला बताया। सांसद सुखदेव भगत ने कहा की आदिवासियों के अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के बजाय उन्हें एक विशेष सांस्कृतिक ढांचे में ढालने की कोशिश की जा रही है।
आरएसएस की विचारधारा पर निशाना साधते हुए कहा कि ये संगठन आज तक आदिवासी शब्द को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। जानबूझकर वनवासी शब्द का इस्तेमाल कर आदिवासियों की गौरवशाली परंपरा, संघर्ष और मूल पहचान को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। सांसद ने कहा कि आदिवासी शब्द केवल एक नाम नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विविधता, सह-अस्तित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि आज मंचों पर आदिवासियों के सम्मान की बातें की जाती हैं, लेकिन जमीन पर उनके हिस्से सिर्फ संघर्ष, विस्थापन और शोषण आ रहा है। सांसद ने आरोप लगाया कि भाजपा और आरएसएस आदिवासियों के वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाकर सांस्कृतिक और भावनात्मक राजनीति कर रहे हैं।
प्रेस वार्ता के दौरान सरना धर्म कोड का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। नेताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड विधानसभा से सरना धर्म कोड की मांग पारित कर केंद्र सरकार को भेजी गई थी, लेकिन आज तक इस पर कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई।
उन्होंने केंद्र सरकार पर आदिवासियों की धार्मिक पहचान की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि देश में जंगलों में रहने वाले शेरों और वन्य जीवों की गिनती तो गंभीरता से की जाती है, लेकिन 15 करोड़ आदिवासियों की धार्मिक पहचान को मान्यता देने में केंद्र सरकार पीछे हट जाती है। यह आदिवासियों की आस्था और अस्मिता के साथ अन्याय है।
कांग्रेस नेताओं ने विकास परियोजनाओं के नाम पर जंगलों की कटाई और आदिवासियों के विस्थापन पर भी चिंता जताई। उन्होंने छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगलों और अंडमान-निकोबार के ग्रेट निकोबार ट्रंक रोड प्रोजेक्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि कॉर्पोरेट हितों के लिए बड़े पैमाने पर जंगल उजाड़े जा रहे हैं।
आरोप लगाया गया कि ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत 238 हेक्टेयर से अधिक जंगल साफ किए जा रहे हैं, जिनमें आदिम जनजातियों के लिए आरक्षित भूमि भी शामिल है। करीब 10 लाख पेड़ों की कटाई से आदिवासियों और प्रकृति के सह-अस्तित्व पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार पर समाज की विविधता और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देश को भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक आधार पर बांटने की कोशिश की जा रही है, ताकि लोगों के बीच तनाव पैदा हो और असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके।
नेताओं ने कहा कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक हथियार बना रही है। प्रेस वार्ता के अंत में कांग्रेस नेताओं ने राहुल गांधी के उस बयान का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने आदिवासियों को देश का पहला और असली निवासी बताया था।
नेताओं ने कहा कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का अधिकार केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि कांग्रेस की वैचारिक प्रतिबद्धता है। कांग्रेस नेताओं ने चेतावनी देते हुए कहा कि आदिवासियों की पहचान और अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
उन्होंने भाजपा और आरएसएस से आदिवासियों के नाम पर दिखावा और सांस्कृतिक नौटंकी बंद करने तथा उनके संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करने की मांग की। प्रेस वार्ता में झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ,विधायक राजेश कचछप ,रामेश्वर उरांव पूर्व विधायक गीता श्री उरांव सहित अनेक कांग्रेसी उपस्थित थे।