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अपने धर्म और संस्कृति से जुड़कर चलने से ही समाज का होगा विकास : सूरज अग्रवाल

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अपने धर्म और संस्कृति से जुड़कर चलने से ही समाज का होगा विकास : सूरज अग्रवाल
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एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। आज हिंदू समाज अपने धर्म और संस्कृति को भूलकर नेतागिरी के चक्कर में जात-पात को बढ़ावा देने में और दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। समाज में एक जुटता जरूरी है, परंतु अपने धर्म को और संस्कृति को भी साथ लेकर चलने की आवश्यकता है; क्योंकि राजनीतिक करने वाले लोग जात-पात वर्ण में हमें बांट कर फायदा उठाने का प्रयास करते रहे हैं। 

यह समझने की आवश्यकता है। निश्चित रूप से समय बदल रहा है। लोग जात-पात से ऊपर उठकर शुद्ध सनातनी बनने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका प्रमाण है। मंदिरों में होने वाली भीड़ जिसकी झलक देखने को मिल रहा है। ठीक उसी तरह हमारे आदिवासी समाज के भी हमारे भाई बंधु युवा पीढ़ी अपने संस्कृति को भूलते हुए वेस्टर्न कल्चर को ज्यादा अपना रहे।

अगर यही स्थिति रही, तो आदिवासी समाज का पतन निश्चित है। अब समय आ गया है कि आदिवासी समाज को भी जात पात को भूलकर एकजुट होकर अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए खड़ा होना पड़ेगा। तब कहीं जाकर हम सभी सरना सनातनी भारत के साथ-साथ अपने झारखंड प्रदेश का विकास कर पायेंगे; क्योंकि झारखंड प्रदेश में जितने भी खनिज संपदा का उत्खनन होता है। 

लगभग सारा जमीन हमारे आदिवासी मूलवासी भाइयों का है और उनकी स्थिति को देखा जाये तो सबसे गरीब और सबसे अशिक्षित हमारे आदिवासी भाई ही है। आज झारखंड प्रदेश को चलाने वाले ब्यूरोक्रेट को आप देखेंगे, तो बैठे हुए लगभग सभी वरिष्ठ पदाधिकारी बाहरी है। क्या हमारे झारखंड के आदिवासी, मूलवासी कुर्सी में बैठकर झारखंड को नहीं चला सकते हैं। निश्चित रूप से चला सकते हैं। 

परंतु हम झारखंडियों को जान-बूझकर शिक्षा से दूर रखा गया ताकि यहां से खनिज संपदा का दोहन हो सके। क्योंकि जो स्थानीय होगा उसी को अपने गांव शहर प्रदेश का दर्द समझ में आयेगा। आज झारखंड बने हुए 26 साल हो गया इन 26 वर्षों में सिर्फ और सिर्फ झारखंड को लूटने का प्रयास किया गया। विकास के नाम पर सिर्फ लोगों को भ्रमित किया गया। 

जाति धर्म के नाम पर लड़ाया गया और नेता पदाधिकारी अपना कमाई दिन दोगुना रात चौगुना करते चले गये और झारखंड के गरीब और गरीब होते चले गये। आज झारखंड की पहचान खनिज संपदा से ही है। जब सारा खनिज यहां से चला जायेगा, तो झारखंड की दुर्दशा क्या होगी? यह सोचकर मन विचलित हो जाता है। 

झारखंड में खनिज संपदा का भरमार होने के बाद भी आदिवासी मूलवासी दूसरे राज्य में रोजगार करने को जाते हैं। इससे ये समझ में आता है कि हम झारखंडी किस ओर जा रहे हैं? इसलिए समय रहते हम सभी को जात धर्म से ऊपर उठकर एकजुट होना होगा। तब हमारे आने वाले पीढ़ी का भाग्य को हम सभी बदल सकते हैं। जागो झारखंडी जागो नहीं तो कुछ वर्षों के बाद राजनीति के चक्कर में झारखंड से भागो।

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