सरहुल की धूम-प्रकृति के प्रति आस्था देखनी हो तो आइये झारखंड
टीम एबीएन, रांची। सरहुल एक ऐसा पर्व है, जिसमें प्रकृति के प्रति समर्पण और आस्था को दशार्ता है। इस मौके पर एक बार फिर लोगों का उत्साह चरम पर है। जनजाति समुदाय की महिलाएं पारंपरिक रूप से पूजा अर्चना करने में जुटी हैं।
इस दौरान रांची के केंद्रीय सरना समिति के प्रांगण में आस्था का अदभुत नजारा देखने को मिला। जहां एक भरनी आस्था में इतना लीन हो गयी कि वो सीधे तौर पर चाला मां और धर्मेश के प्रति समर्पित हो गयी।
पाहन मोहन तिर्की इसे अंधविश्वास मानने से इनकार करते हुए कहते हैं कि यह आस्था का परम सत्य है। जिस दौरान यह महिला जो भरनी कहलाती हैं को चाला मां और धर्मेश से संदेश मिलता है जिसे लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है। कुछ देर में वो सामान्य जीवन में आ जाएगी।
वहीं, केंद्रीय सरना समिति के पूर्व महासचिव संतोष तिर्की कहते हैं कि आज विज्ञान भी मान रहा है कि आदिवासियों का प्रकृति के प्रति समर्पण सही है, जिसका प्रमाण इन महिलाओं का समर्पण है।
इस अवस्था में सिर्फ चाला और धर्मेंश की स्तुति ही उन्हें नजर आती है। उन्होंने कहा कि सरहुल जनजाति समाज का खास पर्व है जिसे हम नव वर्षारंभ के रूप में मनाते हैं और आज से शुभ कार्य की शुरुआत करते हैं। इस मौके पर पाहन पहनाइन की शादी भी होती है जो हमें धर्मेश के संदेश हम तक पहुंचाते हैं।
सरहुल को झारखंड के जनजाति प्रकृति का महापर्व के रूप में मना रहे हैं। पूरी आस्था और उमंग के साथ मनाया जा रहा यह पर्व जनजातियों के लिए खास है। इस मौके पर सखुआ (साल) के फूलों को खास तौर पर लोग सिर पर लगाते हैं।
इस दौरान सरना स्थल (जनजातियों का पूजा स्थल) पर पाहन यानी पुजारी द्वारा साल के वृक्ष की पूजा की जाती है और सखुआ फूल चढ़ाए जाते हैं। पूजा के दौरान पाहन दो घड़ों में पवित्र जल और सखुआ की टहनियों से आगामी मानसून और वर्षा का पूवार्नुमान लगाने की परंपरा है।