- गुरुकुल परिवार एक दिन कोटारी के ग्रामीणों के साथ बिताया
- गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता कर आत्मीय भाव प्रबल होता है: आचार्य शरच्चंद्र
- लोहरदगा के अंतिम घर और व्यक्ति की सहायता के लिए गुरुकुल शांति आश्रम परिवार अंतिम गांव कोटारी पहुंचा
- ग्रामीणों को कंबल और बच्चों को शैक्षणिक सामग्री मिला
एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। लोहरदगा और गुमला जिला सीमा पर स्थित लोहरदगा पेशरार प्रखंड के रोरद पंचायत अंतर्गत कोटारी गांव में निवास करने वाले समाज के अंतिम घर और व्यक्ति से आत्मीय जुड़ाव के उद्देश्य को लेकर गुरुकुल शांति आश्रम लोहरदगा के आचार्य शरच्चंद्र आर्य के नेतृत्व में आश्रम आठ सदस्य टीम रविवार को पूरा दिन गांव के गरीबों और जरूरतमंदों के बीच अपना समय बिताया। इस अवसर पर समरसता यज्ञ का आयोजन किया गया। आश्रम के आचार्य शरच्चंद्र आर्य के आचार्यत्व में यज्ञ में तमाम ग्रामीणों ने आहुतियां दी। आश्रम की ओर से ग्रामीणों की सेवा की गई । यह आश्रम के परोपकार और मानवीय मूल्यों को दर्शाता है।
गुरुकुल शांति आश्रम और आर्य समाज संस्था ने ग्रामीणों के बीच कंबल का वितरण किया। सामूहिक भोजन में तमाम ग्रामीण शामिल हुए। गांव के तमाम बच्चों को शैक्षणिक सामग्रियां दी गई। बच्चों के लिए खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में श्रेष्ठ रहे प्रतिभागी बच्चों को सम्मानित किया गया।
मौके पर शरच्चंद्र आर्य ने कहा कि यज्ञ सनातन संस्कृति के साथ प्रकृति से जुड़ा हुआ कार्यक्रम है। आदिवासी समाज प्रकृति पूजक है। यज्ञ- हवन विशुद्ध रूप से प्रकृति की पूजा है। हवन सामग्री जड़ी बूटियां से युक्त होता है। जल और गोरस से प्राप्त घी का हम उपयोग कर वातावरण को शुद्ध बनाते हैं। यज्ञ से हमारी संस्कृति सशक्त होती है। लोग निरोग बनते हैं। बच्चों में संस्कार आता है। इससे सनातन संस्कृति को और बल मिलता है। सदियों से यह परंपरा गुरुकुलों के माध्यम से चल रहा है।
मौनी अमावस्या का दिन गरीबों और जरूरतमंदों के बीच दान पूर्ण करने का अवसर आज कोटारी गांव में मिला है। लोहरदगा से 55 किलोमीटर दूर पुतरार- कोटारी गांव में आकर ग्रामीण का प्रेम और कार्यक्रम में सहभागिता करना निश्चित रूप से संबल प्रदान करने वाला है। इस गांव में लगभग 40 घर है। और इसकी आबादी तकरीबन 325 है। यहां तीन आंगनबाड़ी केंद्र है। प्राइमरी स्कूल है।
नल जल योजना एक यूनिट लम्बे समय से खराब पड़ा हुआ है। गांव के दो चापाकल भी खराब पड़े हैं। सड़क नाम का कोई चीज ही नहीं है। अच्छी बात यह है की लोहरदगा से इतनी दूर पर स्थित इस गांव में एक रेलवे, एक आर्मी, और एक सहायक पुलिस के पद पर कार्यरत है। अभी भी गांव में शिक्षा का आभाव है। ऐसे गांव में गुरुकुल परिवार का पहुंचना, उनके बीच एक दिन बिताना, निश्चित रूप से ग्रामीणों को मनोबल को बढ़ाता है।
आश्रम के भूषण प्रसाद ने कहा कि हम चाहते हैं की इस सुदूरवर्ती गांव में शिक्षा-स्वास्थ्य सहायता मिले। आत्मनिर्भर बनाने के लिए कौशल प्रशिक्षण देना जैसे कार्य हो, इससे जरूरतमंदों को तत्काल राहत मिलती है। इससे ग्रामीण सशक्त बनते हैं। इसे ही सेवा या धर्म का सार कहा जाता है। इस कार्यक्रम में ठंड से पीड़ित लगभग 75 जरूरतमंदों के बीच कंबल दिया गया।
गुरुकुल शांति आश्रम की शिक्षिका ज्योति कुमारी ने शिक्षा और कौशल विकास ,बच्चों को शिक्षा देना, युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कौशल प्रशिक्षण देने पर बोल दिया।नीरज कुमार ने कहा कि आजीविका सहायता छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए सहायता, स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने पर कई स्तर पर लाभ मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि गुरुकुल शांति आश्रम का सामाजिक जुड़ाव के तहत गरीबों के साथ समय बिताना, उनकी समस्याओं को सुनना और उन्हें भावनात्मक समर्थन देना। मानवीय कर्तव्य जरूरतमंदों की मदद करना सबसे बड़ा धर्म है, यह धार्मिक और नैतिक कर्तव्य माना जाता है। ग्रामीणों का सशक्तिकरण, सिर्फ दान नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करना है जैसा आश्रम के द्वारा किया जा रहा है।
सामाजिक समरसता यज्ञ के माध्यम से समाज के सभी वर्गों को जोड़ना और उनमें एकता लाना यह गुरुकुल का उद्देश्य है।
गुरुकुल का समाज के कमजोर वर्गों के प्रति निभाए जाने वाले उत्तरदायित्वों को दर्शाता है, जो उन्हें गरीबी और कठिनाइयों से उबारने में मदद करता है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में सुखनाथ नगेसिया, चांदमुनी उरांव, बिपता उरांव, बालमती उरांव, चमन खेरवार जिरमनिया देवी, सीतामुनि उरांव, लक्ष्मण उरांव, धनलाल उरांव मनराम उरांव , सुकरा उरांव, बिहार उरांव, विनोद उरांव, फूलदेव उरांव, पर्वतीया उरांव, विरसो उरांव, जमुना उरांव, देवनाथ, उरांव कंदरा उरांव, बिनेश्वर उरांव आदि ने महत्वपूर्ण योगदान किया।