- लोहरदगा से शुरू से होकर झारखंड, बिहार और यूपी के कुछ क्षेत्रों में बन गया है अभियान
- पुस्तक खरीदने के अभियान ने बना दिया ज्ञान का भंडार
- बीएस कालेज लोहरदगा के अंग्रेजी विभाग अध्यक्ष ने 35 साल पहले अभियान का किया था आगाज
टीम एबीएन, लोहरदगा। बीएस कालेज लोहरदगा के पूर्व प्राध्यापक राम भगवान सिंह ने कहा कि सरस्वती चतुर्थी की अवधारणा वैचारिक चिंतन की उपज है। जो आज की उपयोगितावादी विचारधारा को संपुष्ट करती है। सदियों से सर्वमंगलकारी गणेश की पूजा-आराधना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। जिसे महामना काल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी को धार्मिक और सांस्कृतिक समारोह का भव्य स्वरूप प्रदान किया था।
संभवत: ऐसी ही अंतः प्रेरणा से वर्ष पहले मेरे मन में यह विचार आया कि जिस तरह दीपावली पूर्व धनतेरस के अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है, क्या ही अच्छा हो कि हम वसंत पंचमी के एक दिन पूर्व सरस्वती चतुर्थी की नेक परम्परा का श्रीगणेश करें। उस दिन हर विद्या प्रेमी पुस्तक खरीदें।
कोई भी पुस्तक, कहीं से भी अपनी आवश्यकता और अभिसन्धि के अनुसार। वसंत पंचमी के पूर्व सरस्वती चतुर्थी की अवधारणा इसलिए मनुकूल है क्योंकि विशेषतया उत्तर भारत में बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा होती है। स्कूलों में शहर-देहात में जगह-जगह वीणापाणि ज्ञानदेवी सरस्वती की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं।
उनकी पूजा की जाती है। पुस्तक खरीदने की अनुशंसा तो स्वमेन स्पष्ट है। पुस्तकें तो स्वयं सरस्वती-स्वरूप हैं। पुस्तक- प्रेम सरस्वती की पूजा है, बंदगी है। एक बात और, आज टीवी संस्कृति के हावी होने से पुस्तक-संस्कृति वृष्टिछाया में पड़ गई है। युग युग से संन्चित ज्ञानराशि से हमारी दूरी बढ़ती जा रही है।
ऐसे में पुस्तक संस्कृति की पुर्नस्थापना समय की मांग है। आज निस्संदेह सरस्वती की मूर्तियां स्थापित की जाती है, मगर क्या सचमुच हम उस ज्ञानदेवी की पूजा करते हैं? सच तो यह है कि सजावट की चकाचौंध और लाउडस्पीकरों के शोर में भक्ति भावना तिरोहित हो जाती है। वसंत पंचमी का यह त्यौहार मात्र वसंतोत्सव रह जाता है। सरस्वती की साधना उपेक्षित रह जाती है।
साथ ही, आज कई पुरानी परम्पराएं निर्जीव और बेमानी हो गई हैं। जिन्हें त्यागने की जरूरत है। मगर यह भी जरूरी है कि उन्हें सार्थक और जीवन मूल्य वर्धक नई परम्पराओं से स्थानापन्न किया जाए। ऐसे में बसंत पंचमी के एक दिन पूर्व सरस्वती चतुर्थी की नई परम्परा हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रख सकती है। मैं विगत 36 वीं से यह अभियान चला रहा हूं। आशा है, पाठक इसे इसी भाव से ग्रहण करेंगे।