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यशस्विनी का स्वागत किया जाना चाहिए...

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यशस्विनी का स्वागत किया जाना चाहिए...
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मुरलीधर 

टीम एबीएन, रांची। रांची लोक सभा से कांग्रेस यानी इंडिया गठबंधन की उम्मीदवार सुश्री यशस्विनी सहाय चुनाव मैदान में हैं। वैसे तो झारखंड की राजधानी रांची एक संवेदनशील लोकसभा सीट रहा है। सांप्रदायिक धु्रवीकरण के कारण यह सीट लगातार भारतीय जनता पार्टी के खाते में जा रहा है। 

लेकिन इसी सीट से तीन बार कांग्रेस के दिग्गज नेता सुबोधकांत सहाय ने भाजपा को हराया ही नहीं, केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह भी बनाया। जब वे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री के स्वतंत्र प्रभार में रहे। रांची सीट से यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे एकमात्र उम्मीदवार हैं। 

यशस्विनी को टिकट दिये जाने से कई प्रकार के लोग नाराज हैं। कुछ इसे परिवारवाद का वीभत्स चेहरा बताकर भाजपा स्टाईल में गाली दे रहे हैं, तो कुछ इसे सीट गंवाना भी कह रहे हैं। लेकिन भारतीय राजनीति में जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि अगर संभ्रांत वर्ग राजनीति से दूर रहा, तो राजनीति को अपराधी और भ्रष्टाचार से बचाना कठिन होगा। 

आज अगर ईमानदार और सुलझे चश्मे से देखें तो राजनीति को दलदल मानकर एक बड़ा वर्ग जो मुश्किल से वोट डाल आता है, सिर्फ भाषण देता है कि ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए। लेकिन इस बात की प्रसंशा होनी चाहिए कि यशस्विनी ने अपने पिता के आग्रह को स्वीकार कर अपने बेहतरीन और व्यवस्थित करियर को छोड़कर राजनीति में कदम रखा। 

यह सच है कि उसे व्यक्तिगत तौर पर राजनीति का कोई ककहरा मालूम नहीं है, लेकिन बचपन से उसे एक राजनीतिक माहौल अवश्य मिला है। आज के युवा जिस प्रकार राजनीति से दूर रहना चाहते हैं और आइटी, वित्त, वाणिज्य, प्रशासनिक, जहाजरानी सहित अन्य नौकरियों की मोटी सैलरी विदेश जाकर जॉब के प्रति सक्रिय होते हैं, उससे उलट अगर कोई राजनीति में आता है तो दिल से उसका स्वागत करना चाहिए। 

वह युवा अगर देश की बेटी है, तो उसकी आलोचना सिर्फ उसके पिता के राजनेता होने के कारण नहीं की जा सकती है। इस बात का कोई काट है कि विगत 50 वर्षों में रांची के इतिहास में इतनी उच्च शिक्षा प्राप्त कोई राजनेता सामने आया हो। झारखंड की राजनीति में ऐसे युवाओं का आना सुखद संकेत है। आज जिस परिवारवाद की आलोचना हो रही है उसे पारिवारिक संस्कार माना जाना चाहिए। 

देश की लोकतांत्रिक ढांचा में इस प्रकार के उच्च शिक्षा प्राप्त सांसद का होना गर्व की बात है। अहम सवाल है कि भारतीय राजनीति में ही परिवारवाद को ढाल बनाकर प्रतिभाओं को रोका भी नहीं जाना चाहिए। मुझे याद आ रहा है कि एक बार एक बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद ने साक्षात्कार में कहा था कि परिवारवाद की सीमा है। 

मेरा बेटा क्रिकेटर है, अगर बेहतर खेल नहीं खेलेगा, तो क्या सिर्फ मेरा बेटा होने के कारण सफल हो जायेगा? आज का दौर एक योग्य, प्रतिभावान और जुझारू युवाओं का दौर है और यशस्विनी का एक राष्‍ट्रीय पार्टी से चुनाव लड़ना उसके राजनीतिक जीवन की शुरुआत है। देशभर में इस प्रकार के पढ़े-लिखे सुलझे युवाओं का राजनीति में स्वागत किया जाना चाहिए। उनके माता-पिता और परिजनों को भी इस लोकतंत्र के प्रति आस्था के लिए बधाई और शुभकामना देना चाहिए। 

व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर देश को अच्छे युवा लीडर्स की आवश्यकता है और पूरे देश में इस प्रकार के पढ़े-लिखे और जुझारू जन प्रतिनिधियों को बगैर दल और उनके परिवार को देखे लोकतंत्र के हित में समर्थन करना चाहिए। महिलाओं के लिए संसद में 33 फीसदी आरक्षण और परिसीमन के बाद की राजनीतिक जमीन पर युवाओं का स्वागत करे देश। (लेखक एबीएन के प्रधान संपादक हैं।)

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