एबीएन डेस्क। राज्य सरकार की ओर से वेतनमान की जगह मानदेय में बढ़ोतरी किए जाने का प्रारूप देने पर प्रदेश के पारा शिक्षकों का पारा चढ़ गया है। इसके खिलाफ राज्यभर के पारा शिक्षकों में आक्रोश है। पारा शिक्षकों का कहना है कि उनके साथ धोखा हुआ है। सरकार के नए प्रस्ताव के खिलाफ रविववार को सभी जिलों में पारा शिक्षकों की बैठक हुई। वे सोमवार को अपने संघर्ष की रणनीति का ऐलान करेंगे। एकीकृत पारा शिक्षक संघर्ष मोर्चा का कहना है कि वेतनमान की लड़ाई जारी रहेगी। मोर्चा का कहना है कि पारा शिक्षकों के लिए सेवा शर्त नियमावली वेतनमान के लिए बनाई जा रही थी, न कि मानदेय में बढ़ोतरी के लिए। मानदेय बढ़ोतरी तो झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद की कार्यकारिणी से भी हो जाती है, इसके लिए सेवा शर्त नियमावली की क्या आवश्यकता है। पारा शिक्षकों के मानदेय में हर साल 10 फीसदी की बढ़ोतरी पूर्व का ही फैसला है। ऐसे में करीब तीन साल का मानदेय बढ़ोतरी नहीं हो सका है, वही अब राज्य सरकार करना चाह रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चुनाव के दौरान साफ कहा था कि उनकी सरकार बनने पर तीन महीने के अंदर पारा शिक्षकों का स्थायीकरण किया जाएगा और वेतनमान का लाभ दिया जाएगा, लेकिन यह तीन महीना दो साल में बदल गया और मानदेय बढ़ोतरी का लॉलीपॉप थमाया जा रहा है। पिछले दो साल में कोरोना, शिक्षा मंत्री का स्वास्थ्य लेकर उनकी ओर से बार-बार वेतनमान का दिा जा रहा आश्वासन के बाद पारा शिक्षकों को सरकार से उम्मीद थी, लेकिन मानदेय बढ़ोतरी का प्रारूप उस पर पानी फेरता दिख रहा है।