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भारत से भागती विदेशी कंपनियां...

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भारत से भागती विदेशी कंपनियां...
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एबीएन सेंट्रल डेस्क। केयर्न से लेकर हचिसन, हार्र्ली डेविडसन, जनरल मोटर्स, फोर्ड, होल्सिम, सिटीबैंक, बार्कलेज, आरबीएस और अब मेट्रो कैश ऐंड कैरी तक बड़ी वैश्विक कंपनियों के भारत से बाहर जाने अथवा यहां अपने कारोबार का आकार छोटा करने की घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है। गत वर्ष दिसंबर में उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद को बताया था कि 2014 से नवंबर 2021 के बीच भारत में पंजीकृत कार्यालय या अनुषंगी कंपनी रखने वाली 2,783 विदेशी कंपनियों ने अपना कामकाज बंद कर दिया। यह आंकड़ा बहुत बड़ा है क्योंकि गोयल के जवाब के मुताबिक देश में केवल 12,458 विदेशी अनुषंगी कंपनियां सक्रिय हैं। ऐसी कंपनियों ने देश से बाहर जाने के लिए विशिष्ट कारण भी गिनाए हैं। बाजार में पैठ नहीं बना पाना (जीएम, फोर्ड), पर्यावरण के अनुकूल कारोबार में बदलाव (होल्सिम) और आंतरिक पुनर्गठन (सिटी) जैसे कारण बताए गए। परंतु कई कंपनियों ने नियामकीय अनिश्चितता (केयर्न, मेट्रो, 19 वर्ष बाद) या ऊंचे शुल्क की बाधाओं (हार्ली) के कारण भी यहां कारोबार समेटा। ये निर्गम आंतरिक रणनीतिक कारणों से हों या बाहरी कारणों यानी नीतिगत या नियामकीय अस्पष्टता के कारण, तथ्य यही है कि इन विदेशी कंपनियों को भारत में कारोबार करना उचित नहीं लगता और यह चिंता का विषय होना चाहिए। यानी उन्हें इस कथानक पर यकीन नहीं है कि भारत दुनिया के सबसे तेज विकसित होते बाजारों में से एक है। अमेरिका के साथ कारोबारी युद्ध के बाद चीन ने जो दबाव बनाया है उसने भी भारत को एक वैकल्पिक केंद्र बनने का अवसर दिया। चीन के मौजूदा कठोर कोविड-19 लॉकडाउन ने इन अवसरों में और इजाफा किया है। हालांकि भारत ने कहा कि वित्त वर्ष 2022 में उसने रिकॉर्ड 83.57 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल किया लेकिन इसमें से ज्यादातर पैसा यूनिकॉर्न स्टार्टअप को गया। दबाव में चल रहे चीन में वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में ही 74.47 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आ गया है। भारत के नीति निर्माता ऐपल के वेंडर्स मसलन फॉक्सकॉन और विस्ट्रॉन की मौजूदगी और उनके उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के अधीन संयंत्र स्थापित करने को रेखांकित कर सकते हैं। वास्तव में यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन ऐपल ने वियतनाम और इंडोनेशिया में भी काफी निवेश करने की घोषणा की है। इससे यही संकेत निकलता है कि भारत निवेश के लिए अनिवार्य केंद्र नहीं है। यहां तक कि पीएलआई योजना भी दूरसंचार क्षेत्र के अलावा उपक्रमों को बहुत लुभा नहीं पाई है। सेमीकंडक्टर क्षेत्र की बात करें तो सरकार की इच्छा भारत को हाईटेक केंद्र बनाने की है लेकिन अब तक कोई बड़ी कंपनी आगे नहीं आयी है। फोर्ड ने पहले भारत से कारोबार समेटने की बात कही थी लेकिन बाद में वह पीएलआई योजना के तहत कार बनाने को तैयार हो गई थी लेकिन अब उसने इससे भी किनारा कर लिया है। कंपनियों के इस प्रकार अलग-अलग होने से संकट में अधिक इजाफा भले न हो लेकिन इससे भारत की रोजगार निर्माण करने वाले विनिर्माण केंद्र की छवि को धक्का पहुंचेगा। इस संदर्भ में आर्थिक नीति निमार्ता शायद राष्ट्रवादी विचारधारा के ढांचे से इतर कई मुद्दों को हल करना चाहें। पहली बात तो यह कि उच्च संरक्षण वाले शुल्क की रणनीति जो आत्मनिर्भरता की नीति के मूल में है वह उन कंपनियों के लिए कारगर है जो वैश्विक आपूर्ति शृंखला के तहत संचालित हैं। दूसरा, ऐसे नियामकीय माहौल में जहां घरेलू कंपनियां और सरकार अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अवार्ड को अपनी मर्जी से अनदेखा कर देती हैं, क्या सही संकेत जाता है। हालांकि सरकार ने केयर्न एनर्जी के मामले में शर्मनाक हालात में कदम वापस खींच लिए लेकिन मौजूदा फ्यूचर-एमेजॉन मामला भी भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने का काम नहीं करेगा। कुल मिलाकर स्थिर निवेश केंद्र के रूप में भारत के लिए परिदृश्य बहुत अच्छा नहीं है और इसका अर्थ यह है कि हम बड़ा अवसर गंवा रहे हैं।
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