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क्या पीएम की अपील से घट जायेगा इंधन बिल!

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क्या पीएम की अपील से घट जायेगा इंधन बिल!
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संकट और पीएम मोदी की अपील 

क्या वर्क-फ्रॉम-होम से वाकई घटेगा भारत का भारी-भरकम ईंधन बिल? 

पश्चिम एशिया संकट के बीच पीएम मोदी ने ईंधन बचाने के लिए वर्क-फ्रॉम-होम की अपील की है। लेकिन क्या यह मॉडल भारत की तेल निर्भरता कम कर पायेगा 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर दुनिया भर के तेल बाजारों में हलचल मचा दी है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि हम अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों और कंपनियों से अपील की है कि जहां तक संभव हो, वर्क-फ्रॉम-होम और वर्चुअल मीटिंग्स के कल्चर को फिर से अपनाया जाये। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई घर से काम करने से भारत का ईंधन बिल कम हो सकता है? 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह मामला सिर्फ कर्मचारियों की सहूलियत या दफ्तर की उत्पादकता तक सीमित नहीं है। इसके तार सीधे तौर पर देश की तेल पर निर्भरता, विदेशी मुद्रा भंडार और घर के बिजली बिल से जुड़े हुए हैं। सुनने में तो यह सीधा लगता है कि दफ्तर कम जाएंगे तो पेट्रोल-डीजल कम जलेगा, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। जब कोई कर्मचारी घर से काम करता है, तो ऊर्जा का बोझ सड़कों और दफ्तरों से शिफ्ट होकर घरों पर आ जाता है। 

सड़क से घर तक: ऊर्जा की शिफ्टिंग 

दिल्ली के थिंक टैंक टेरी में बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा विभाग के निदेशक आलेख्य दत्ता ने इस पर अहम राय दी है। उन्होंने बताया कि हाइब्रिड वर्क मॉडल भारत के ईंधन संरक्षण लक्ष्यों को मजबूती दे सकता है, खासकर बड़े महानगरों में। उनके मुताबिक, हाइब्रिड काम करने से उन शहरों में ईंधन की बचत होगी जहां ट्रैफिक जाम की वजह से निजी गाड़ियां घंटों सड़क पर खड़ी रहती हैं। चूंकि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए पीक आवर्स के दौरान अगर सड़कों पर भीड़ कम होती है, तो इससे तेल की मांग में कमी आएगी और शहरों में प्रदूषण भी कम होगा। 

क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े? 

ईंधन की खपत और आवाजाही के बीच के संबंध को समझने के लिए हमें कोविड-19 लॉकडाउन के दौर को देखना होगा। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2020 में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत अप्रैल 2019 के मुकाबले 45.8 प्रतिशत गिर गयी थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सड़कें सूनी थीं और औद्योगिक गतिविधियां ठप थीं। 

हालांकि, कर्मा मैनेजमेंट ग्लोबल कंसल्टिंग सॉल्यूशंस के एमडी प्रतीक वैद्य आगाह करते हैं कि हमें लॉकडाउन जैसी पाबंदियों को ईंधन बचाने का मॉडल नहीं मानना चाहिए। उनके अनुसार, सही तरीका यह है कि हम समझदारी से हाइब्रिड मॉडल अपनायें, गैर-जरूरी यात्राएं कम करें और फिजिकल मीटिंग्स की जगह वीडियो कॉल का सहारा लें। घबराहट में सब कुछ बंद करना इसका समाधान नहीं है। 

सबसे ज्यादा बचत किसकी होगी? 

वर्क फ्रोम होम से होने वाली बचत इस बात पर निर्भर करती है कि कर्मचारी दफ्तर कैसे पहुंचता है। सबसे ज्यादा फायदा उन लोगों को होता है जो लंबी दूरी तय करने के लिए खुद की पेट्रोल कार, डीजल टैक्सी या टू-व्हीलर का इस्तेमाल करते हैं। इसके विपरीत, जो लोग मेट्रो, बस या साइकिल से दफ्तर जाते हैं, उनके घर से काम करने पर ईंधन की बचत बहुत मामूली होती है। 

बेंगलुरु, गुरुग्राम, नोएडा, हैदराबाद, पुणे, मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों में, जहां दफ्तरों के बड़े कॉरिडोर हैं और लंबी दूरी तय करना मजबूरी है, वहां वर्क फ्रोम होम  ईंधन की मांग में बड़ी गिरावट ला सकता है। प्रतीक वैद्य का कहना है कि पेट्रोल की बिक्री मुख्य रूप से दोपहिया वाहनों और निजी कारों पर टिकी है, और ये दोनों ही आॅफिस जाने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। उनके मुताबिक, सिर्फ घर से काम करना काफी नहीं है, बल्कि कारपूलिंग और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना भी इस रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। 

घर की बिजली का बिल: एक बड़ी चुनौती 

हाइब्रिड मॉडल की सबसे बड़ी पेचीदगी यह है कि यह ऊर्जा की खपत को खत्म नहीं करता, बल्कि उसकी जगह बदल देता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (कएअ) के 2020 के अनुमान के मुताबिक, एक दिन घर से काम करने पर घर की बिजली की खपत 7% से 23% तक बढ़ सकती है। भारत के संदर्भ में, जहां गर्मी का मौसम लंबा होता है, घर पर रहने का मतलब है ज्यादा देर तक एसी, कूलर और पंखों का चलना। इसके अलावा लैपटॉप, वाई-फाई राउटर और लाइटिंग का खर्च भी जुड़ जाता है।

यानी मुमकिन है कि एक कर्मचारी पेट्रोल का पैसा तो बचा ले, लेकिन महीने के अंत में उसका बिजली का बिल बढ़ जाये। आलेख्य दत्ता कहते हैं कि हालांकि घरों में बिजली का उपयोग बढ़ेगा, लेकिन लंबी अवधि में यह घाटे का सौदा नहीं है। इसका कारण यह है कि पेट्रोल तो हमें विदेश से खरीदना पड़ता है, लेकिन बिजली हम अपने देश में सौर ऊर्जा या अन्य घरेलू स्रोतों से पैदा कर सकते हैं। 

दफ्तरों की बिजली का पेंच 

एक और पेंच दफ्तरों की बिजली खपत को लेकर है। अगर किसी दफ्तर के कुछ कर्मचारी घर से काम कर रहे हैं और कुछ दफ्तर आ रहे हैं, तो कंपनी की बिजली में कोई खास कमी नहीं आती। लिफ्ट, एयर कंडीशनिंग, कैफेटेरिया और सुरक्षा सिस्टम को लगभग उसी क्षमता पर चलाना पड़ता है। 
प्रतीक वैद्य के अनुसार, बचत तभी सार्थक होगी जब हाइब्रिड मॉडल को व्यवस्थित किया जाए। 

उदाहरण के लिए, अगर पूरी टीम या पूरा विभाग एक साथ तय दिनों पर घर से काम करे, तो उस हिस्से की लाइटें और एसी बंद किए जा सकते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी और उकक के 2024 के एक अध्ययन में भी यह बात सामने आयी है कि हाइब्रिड मॉडल से कंपनियों को किराये और यात्रा के खर्च में बचत हुई है, हालांकि टीम वर्क और संवाद में कमी जैसी चिंताएं भी बनी हुई हैं। 

सरकार ने कहा: घबराने की जरूरत नहीं 

फिलहाल सरकार ने साफ किया है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है। मंत्रालयों की एक बैठक के दौरान अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि भारत के पास पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। पश्चिम एशिया के हालात पर नजर रखी जा रही है, लेकिन जनता को घबराने या पैनिक करने की जरूरत नहीं है। 

लेकिन एक्सपर्ट का यही कहना है कि कुल मिलाकर, घर से काम करना भारत के ईंधन बिल को कम करने में मदद तो कर सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां और कर्मचारी इसे कितनी समझदारी से लागू करते हैं। अगर इसे सही तरीके से अपनाया जाए, तो यह न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा, बल्कि शहरों की आबोहवा को भी बेहतर बनायेगा।

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