बासुकीनाथ पाण्डेय
एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। आज हम सब एक पुरानी राजनीतिक घटना को याद कर रहे हैं, जब 1989 में राजीव गांधी चोर है का नारा गूंजा था। यह नारा लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और वीपी सिंह ने मिलकर उठाया था, जो उस समय विपक्ष की ताकत बन गया था।
यह नारा बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक गूंजा और लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लिया। उस समय यह नारा राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ एक मजबूत आवाज बनकर उभरा था, जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी थी। लेकिन समय का पहिया घूमता है, और आज वही लोग, जो कभी एक-दूसरे के खिलाफ नारे लगाते थे, एक साथ दिखाई दे रहे हैं।
लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और उनके समर्थक अब एक मंच पर एकजुट हो गए हैं। यह देखकर लगता है कि राजनीति में सिद्धांतों से ज्यादा सत्ता और गठबंधन की राजनीति हावी हो गई है। क्या यह दोहरा चरित्र नहीं है? जो कल तक चोर कहते थे, आज वही एक साथ खड़े हैं।
1989 का वह दौर याद करें, जब वीपी सिंह ने रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देकर भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोला था। बोफोर्स घोटाले ने राजीव गांधी की सरकार को हिला कर रख दिया था, और जनता ने इसका जवाब चुनाव में दिया। लालू और मुलायम ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था, जो समाजवादी विचारधारा के प्रतीक बन गए थे। लेकिन आज का मंजर कुछ और ही कहानी बयान करता है
राजनीति में गठबंधन और सत्ता की भूख ने पुराने नारों को धुंधला कर दिया है। गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है का नारा अब इतिहास बन चुका है, और आज के दौर में सभी एक-दूसरे के साथ मिलकर सियासी खेल खेल रहे हैं। यह बदलाव जनता के लिए सोचने का विषय है कि आखिर सच्चाई क्या है? क्या यह सब सिर्फ सत्ता के लिए है या कुछ और?
हमें अपने देश की राजनीति को समझने की जरूरत है। हर नेता के पास अपनी कहानी और अपने वादे होते हैं, लेकिन क्या वे वादों पर कायम रहते हैं? लालू, मुलायम और वीपी सिंह की जोड़ी ने कभी एकजुट होकर सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई थी, लेकिन आज उसी सत्ता के लिए वे एक साथ हैं।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है? आइए, हम सब मिलकर सही और गलत की पहचान करें। तो दोस्तों, इस पोस्ट को शेयर करें और अपनी राय दें। क्या आपको लगता है कि राजनीति में सिद्धांत मायने रखते हैं या सिर्फ सत्ता? अपनी टिप्पणियों में बताएं और इस बहस को आगे बढ़ाएं। (लेखक एबीएन से जुड़े हैं।)