एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफ़े में स्वास्थ्य कारणों को वज़ह बताया है। लेकिन राज्यसभा में जिस तरह कुछ विपक्षी सांसदों ने उनका अपमान किया, उसके बाद आहत होकर इस्तीफ़ा देने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
बड़ा अजीब दौर है, प्रधानमंत्री या सत्ता पक्ष को घेरने की बजाय संवैधानिक संस्थाओं और पदों पर सीधा अटैक किया जा रहा है। चुनाव आयोग, संसद के स्पीकर, राज्यसभा के सभापति, सेना, CJI आदि कोई भी संस्था को नहीं छोड़ा गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक को राष्ट्रपत्नी कह अपमानित किया गया।
इमरजेंसी के दौरान विपक्ष के तमाम नेता जेल गए, सत्ता के दुरुपयोग की पराकाष्ठा थी, अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, इसके बावजूद विपक्ष ने कभी संवैधानिक संस्थाओं को निशाने पर नहीं लिया। उस वक्त राष्ट्रपति कैसे बने, सबको पता है। इंदिरा गांधी के कार का दरवाज़ा खोलने राष्ट्रपति बढ़े थे, तब इंदिरा गांधी ने डांट दिया था, अब आप राष्ट्रपति पद पर हैं।
देश ने राम मंदिर आंदोलन, 1962 का पराजय, घेराव, संतों पर गोलीबारी सब देखा, लेकिन किसी ने स्पीकर पर सवाल नहीं उठाया। लेकिन आज वो दौर भी है, जब देश का नेता प्रतिपक्ष उप राष्ट्रपति के चाल की नक़ल करता दिखा। राष्ट्र जगदीप धनखड़ को न्यायपालिका की कमियों और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ़ खुलकर बोलने वाले उप राष्ट्रपति के रूप में याद करेगा।