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महाकुंभ में महास्नान : आस्था के तटबंधों को तोड़कर उमड़ा जनसागर

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महाकुंभ में महास्नान : आस्था के तटबंधों को तोड़कर उमड़ा जनसागर
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संगम की बूदों में उफनाया माघी पूर्णिमा का अनंत विश्वास 

एबीएन सोशल डेस्क। पूजहिं माधव पद जलजाता/ परसि अखय बटु हरषहिं गाता...। संत तुलसी की इस चौपाई का आशय है कि गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की पावन त्रिवेणी में डुबकी लगाकर ऋषि-मुनि, देव-दनुज सभी संगम रूपी सिंहासन पर विराजमान जगत के स्वामी भगवान श्रीहरि माधव के चरण कमल को पूज कर धन्य हो जाते हैं। साथ ही अक्षयवट का स्पर्श कर उनके तन-मन के ताप-संताप हमेशा के लिए मिट जाते हैं। 

विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन महाकुंभ के पांचवें सबसे बड़े स्नान पर्व माघी पूर्णिमा पर एक बार फिर संगम की यही महिमा जगव्यापी श्रद्धा की अमृतमयी बूंदों के स्पर्श की अकुलाहट में साकार हुई। आधी रात से ही माघी पूर्णिमा की पावन डुबकी के लिए मचलता जन सागर दिन भर आस्था के तटबंधों को तोड़कर छलकने के लिए आतुर रहा।मेला प्रशासन ने दोपहर दो बजे तक 12 किमी लंबे संगम के 42 घाटों पर 1.83 करोड़ श्रद्धालुओं के डुबकी लगाने का दावा किया। 

न किसी ने सूर्योदय का इंतजार किया न पुण्यकाल का। आधी रात त्रिवेणी के सुरम्य तट पर हर कोई प्रयाग में माघी पूर्णिमा की महिमा का पुण्य बटोरने की ललक लिए डुबकी मारने लगा। खचाखच भीड़ की वजह से रेती पर न कपड़े रखने की जगह थी न ठिठकने की। उसी जन सैलाब में किसी का झोला तो किसी का कपड़ा और किसी के परिवारीजन आंखों से ओझल होते रहे। 

उसी बीच में पुरोहितों-संतों की शंखध्वनियां भी तन-मन को पुलकित कर रही थीं और घंट-घड़ियाल के बीच आस्था, विश्वास और भक्ति की लहरें भी हर अंतस को छूती रहीं। भक्ति के अनंत सागर से निकली आस्था की दिव्य आभा ने संगम से लेकर चार हजार हेक्टेयर क्षेत्रफ्रल में बसे महाकुंभ नगर के शिविरों से निकले रास्तों पर हर तरफ अद्भुत छटा बिखेर दी। पौ फटते ही पूरब की लाली से फूटी किरणें संगम की लहरों पर उतर कर हर तन-मन में शक्ति और उल्लास का संचार करने लगीं। पुण्य की डुबकी लगाने के साथ ही उन्हीं लहरों पर लोक मंगल के गीत गाये जाते रहे।

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