एबीएन सेंट्रल डेस्क। कतर 12 हजार स्क्वायर किमी में फैला ये देश 1922 तक बसाहट के काबिल नहीं था। यहां रहने वालों में ज्यादातर आबादी मछुआरों की व मोती चुनने वालों की थी। ये खानाबदोश थे जो अरब देशों में घूमते रहते थे। साल 1930 में जब जापान ने मोतियों का प्रोडक्शन शुरू किया तो कतर की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गयी। हालत ये हो गई कि लोग देश छोड़ कर विदेशों में बसने लगे। यहां की आबादी घट कर मात्र 24 हजार रह गयी।
एक तरह से पूरा देश खाली हो चुका था। लेकिन फिर आया साल 1939। कतर के वेस्ट कोस्ट पर दोहा से 149 किमी पर बसें दुखान में मिले काले सोनो में कतर की किस्मत बदल दी।
ब्लेक गोल्ड यानी तेल के कुएं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कतर ने ब्लेक गोल्ड को एक्सपोर्ट करना शुरू कर दिया और यही से शुरू होती है कतर पर पैसों की बरसात। कतर के हालात बदलने लगे जिस देश में लोग रहना पसंद नहीं करते थे वहां के हालात तेजी से बदलने लगे ।1970 तक यहाँ की जनसंख्या 1 लाख के पार हो गयी। 1971 में यानी 1 साल बाद ही इंजीनियर्स ने प्राकृतिक गैस रिजर्व खोज निकाला। जो कि कतर के आधे हिस्से यानी 6000 स्क्वायर किमी में फैला था इसके बाद तो जैसे कतर के वारे न्यारे हो गये।
यहां की जीडीपी 3.7 से बढ़ कर 26.2 हो गयी और पर पर्सन इनकम जिसे हम प्रति व्यक्ति आय कहते हैं वो 50 लाख से भी ज्यादा हो गयी। मतलब कतर में रहने वाला हर इंसान अमीर बन गया ।ऐसा ही कुछ हुआ सऊदी अरब के साथ। साल 1930 तक अरब में अलग अलग कबीले रहते थे। जो अक्सर आपस में लड़ते रहते थे। यहां के लोग ऊंट और भेड़ बकरियों के सहारे अपना गुजरा किया करते थे। लेकिन साल 1932 में यहां के प्रिंस शाह अब्दुल अजीज बिन सऊल को ये पता चलता है कि उनके देश में तेल का बहुत बड़ा रिजर्व है तो वो इस तेल को निकालने के लिये अमेरिकी कंपनी से डील करते हैं।
1938 खुदाई शुरू हुई और इस देश की जमीन से इतना तेल निकलता है कि दुनिया हैरान हो जाती है। इसके बाद सऊदी अरब के भी वारे न्यारे हो गये। तेल बेच कर सऊदी अरब अमेरिका से भी आगे निकल गया। जो लोग 60 हजार कमा रहे थे वो अब 14 लाख कमा रहे थे। यहां के लोग भारत से भी 63 गुना ज्यादा अमिर हो गये ।आज ये देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार है।
दोस्तों कतर और सऊदी अरब की किस्मत बदली यहां के नेचुरल रिसोर्सेज ने। नेचरल रिसोर्सेज वो खजाना है जिसका सही इस्तेमाल किसी भी देश को मालामाल कर सकता है।
और ये सब हम आपको इसलिये बता रहे है कि ऐसा ही एक खजाना भारत के हाथ भी लग गया है। खबरों के मुताबिक भारत को भी 60 लाख टन का वाइट गोल्ड का खजाना हाथ लगा है। जिसकी कीमत बतायी जा रही है 34 लाख करोड़ लेकिन ये कहां मिला है क्या इससे वाकई भारत कतर और सऊदी अरब जैसा अमिर हो जायेगा। अगर हां तो इसमें कितना वक्त लगेगा।
9 फरवरी 2023 को भारतीय भू सर्वेक्षण विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की इस रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर क्षेत्र के रियासी में उन्हें लिथियम का एक बहुत बड़ा भंडार मिला है। इस लिथियम को ही व्हाईट गोल्ड कहते हैं। ये रिजर्व छोटा मोटा नहीं बल्कि 60 लाख टेन का था। देखते ही देखते ये खबर मीडिया की सुर्खियों में आ गयी और कल ही यानी 10 मई 2023 को भी राजस्थान से लिथियम के भंडार मिलने की पुष्टि हुई है अब पूरी दुनिया की नजर अब भारत पर है।
लेकिन सवाल ये है कि लिथियम में ऐसा क्या खास है। लिथियम इतना इंपोर्टेंट क्यों है। इसे जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा।
फरवरी 2022 में रुस ने यूक्रेन पर अटैक कर दिया था। जिसकी वजह बताई गई थी कि यूक्रेन नाटो में शामिल होने वाला था जो रुस के लिए एक खतरा हो सकता है लेकिन कुछ रिसर्चर्स बताते हैं कि इसके पीछे की एक वजह थी वाइट गोल्ड।
एक्सपर्ट अंदाजा लगाते है कि यूके्रन के ईस्टन एरिया में 5 लाख टन लिथियम का रिजर्व है जिसे निकालने के लिए यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने 2021 में आस्ट्रेलिया और चीन की कंपनीयो से डील की थी। रुस भी इस रिजर्व को पाना चाहता था। हालांकि रुस के पास 10 लाख टन का रिजर्व है लेकिन वो साइबेरिया जैसे बेहद ठंडे इलाके में था और उसे निकालना भी महंगा पड़ रहा था। इसलिए रुस को अपनी जरूरत का लिथियम इंपोर्ट करना पड़ता है।
रिसर्चर मानते है की इस लिथियम के भंडार पर कब्जा करने के उद्देश से ही रुस ने यूक्रेन पर अटैक कर दिया। दोस्तों आपने अक्सर सुना होगा की तेल के कुओं पर कब्जा करने के लिए अमेरिका ने इराक और सीरिया जैसे देशों पर हमला किया था। अगर ऐसे ही युद्ध लिथियम के लिए हो सकते हैं क्योंकि लिथियम तेल से अधिक कीमत रखता है।
क्या काम आता है लिथियम : क्यों इसकी इतनी डिमांड है ।इसे जानने के लिए गेम थोड़ा स्कूली नॉलेज याद करना होगा। दोस्ती स्कूल में आपने पीरियोडिक टेबल तो जरूर पढ़ी होगी।
इसी टेबल में तीसरे नंबर पर आता है लिथियम : ये दुनिया का सबसे हल्का मेटल है ये इतना हल्का होता है कि आसानी से पानी में तैरने लगता है और इतना सॉफ्ट होता है कि आप आसानी से इसे चाकू से काट सकते है। ये चांदी जैसे सफेदी वाला मेटल है जो कैमिकल एनर्जी को स्टोर करके इलेक्ट्रिक एनर्जी में बदलता है इसकी इसी क्वालिटी के कारण इसका इस्तेमाल बैट्री बनाने में किया जाता है। 1991 में सोनी कंपनी ने पहली बार हेंडी केमरे ने लिथियम आईरन बैट्री का इस्तेलाम किया था।
इससे पहले लेड बैट्री यूज होती थी : साइटिस्टो ने पाया की लिथियम बैट्री लेड बैट्री से अधिक पॉवरफूल और हल्की होती है ये लंबे समय डिस्चार्ज नहीं होती उन्होंने जिस स्कूटर और कार में इन्हें लगाया उन्हें लंबे समय तक ड्राइव किया जा सकता था। जिन स्मार्टफोन में इन बेट्रिज का इस्तेमाल हुआ वो एक बार के चार्जिंग में ही पूरा दिन काम कर रहे थे फिर क्या था बड़े पैमाने पर लेड बेट्रिज को लिथियम बेट्रिज से रिप्लेस कर दिया गया।
देखते ही देखते फोन घड़ी लैपटॉप रिसटवॉच जहां-जहां भी बैट्री का यूज हो रहा था वहां लेड बेट्रिज को लिथियम बेट्रिज से रिप्लेस कर दिया गया। इस वजह से वर्ल्ड मार्केट में लिथियम की मांग बढ़ती चली गयी। इसकी बढ़ती हुई मांग के चलते विश्व के देशों ने इसका इंपोर्ट एक्सपोर्ट और बेट्रिज की मैन्यूफेचरिंग शुरू कर दी।
आज चीन इसका सबसे बड़ा मेन्युफेक्चरर है और दुनिया 79% लिथियम आयन बैट्रियां चीन में बनायी जा रही थी। भारत भी अपना 80 %लिथियम चीन से मंगवाता है 2020 से 2022 में हमने 6000 का लिथियम खरीदा जिसने 3500 सौ करोड़ का लिथियम चीन से लिया था तो आप सोच सकते है कि हमारा कितना सारा पैसा चीन में जा रहा था।
हालांकि अब जो भारत में रिजर्व मिला है वो चीन के रिजर्व से चार गुणा बड़ा है। अगर इनका ठीक से इस्तेमाल किया जाये तो हम इन्हें खरीदने की बजाए बेचने की स्टेज पर आ सकते हैं। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट माने तो लिथियम और कोबाल्ट जैसे धातुओं की कीमत 2050 तक 500 गुना बढ़ जायेगी।
ऐसे में लिथियम का महंगा होना बिलकुल तय है : पेट्रोलियम तेल और कोयला खत्म होने के कगार पर है और अब विश्व उसके पूरक साधनों की तलाश में है जो प्रदूषण से भी मुक्त हो।
लिथियम के इस्तेमाल से प्रदूषण नहीं होता साथ ही आते है सोलर एनर्जी और विंड एनर्जी पर जो की रीयूजेबल है लेकिन इसे बनाने वाले विंड टरबाईन और सोलर पेनल ने भी लिथियम का ही उपयोग होता है जब हवा न चल रही हो या सूरज न चमक रहा हो तब भी लिथियम बेट्रिज में स्टोर एनर्जी का लोग उपयोग कर सकते है स्कूटर कार बैट्री से चलने वाले ई रिक्शा में भी इसी बैट्री का उपयोग हो रहा है।
2027 तक विश्व में 15 अरब लिथियम बेट्रिज की आवश्यकता होगी अगर हम इनकी आपूर्ति करने में सक्षम हो जाए तो हम सऊदी अरब जैसे संपन्न और लाखों लोगो को रोजगार देने वाले बन जायेंगे। कश्मीर में लिथियम के भंडार 23 वर्ष पूर्व ही खोज लिये गये थे लेकिन तब इसे निकालने की टेक्नॉलजी हमारे पास नही थी। आज टेक्नोलॉजी डेवलप है लेकिन फिर भी इसे निकालने के लिए 5/7 सालों का वक्त लगेगा।
जिन स्मार्टफोन में इन बेट्रिज का इस्तेमाल हुआ वो एक बार के चार्जिंग में ही पूरा दिन काम कर रहे थे फिर क्या था बड़े पैमाने पर लेड बेट्रिज को लिथियम बेट्रिज से रिप्लेस कर दिया गया। देखे ही देखते फोन घड़ी लैपटॉप रिसटवॉच जहां-जहां भी बैट्री का यूज हो रहा था वहां लेड बेट्रिज को लिथियम बेट्रिज से रिप्लेस कर दिया गया।
इस वजह से वर्ल्ड मार्केट में लिथियम की मांग बढ़ती चली गयी। इसकी बढ़ती हुई मांग के चलते विश्व के देशों ने इसका इंपोर्ट एक्सपोर्ट और बेट्रिज की मैन्यूफेचरिंग शुरू कर दी। आज चीन इसका सबसे बड़ा मेन्युफेक्चरर है और दुनिया 79% लिथियम आयन बैट्रियां चीन में बनायी जा रही थी। भारत भी अपना 80% लिथियम चीन से मंगवाता है 2020 से 2022 में हमने 6000 का लिथियम खरीदा जिसने 3500 सौ करोड़ का लिथियम चीन से लिया था तो आप सोच सकते है कि हमारा कितना सारा पैसा चीन में जा रहा था।