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हिमालय की पीड़ा प्रदर्शित करते जोशीमठ के आंसू...

हिमालय की पीड़ा प्रदर्शित करते जोशीमठ के आंसू...
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कुलभूषण उपमन्यु

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जोशीमठ की त्रासदी ने पूरे देश को अचंभित ही नहीं किया है बल्कि हिमालय में विकास की गाड़ी की दिशा पर भी अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। सदियों पुराना शहर आखिर धंस क्यों रहा है। वैसे तो आजादी के बाद से ही हिमालय के लिए विकास योजना को इस क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरण की विशिष्टता के कारण अलग दृष्टि से देखा जाने लगा था। इसी कारण योजना आयोग में भी हिमालय का अलग सेल हुआ करता था। अब नीति आयोग में भी हिमालयन क्षेत्रीय परिषद है। इस परिषद का मकसद है कि हिमालय की विशिष्ट नाजुक स्थिति को ध्यान में रखकर विकास का खाका बनाया जा सके। 

1992 में डॉ एसजेड कासिम की अध्यक्षता में योजना आयोग ने हिमालय में विकास की दिशा और दशा को निर्धारित करने के लिए एक ग्रुप का गठन किया था। इस ग्रुप की रपट 1992 में आ गई थी। ऐसी और भी कोशिश हुईं। बावजूद इसके हिमालयी क्षेत्र में विकास के लिए कोई अलग मॉडल विकसित नहीं किया जा सका। इसका मुख्य कारण यह रहा है कि हिमालयी संसाधनों पर तो योजनाकारों की नजर रही किंतु उनके दोहन या दोहन के तरीकों के कारण कितनी विपदाएं हमें घेर सकती हैं और देश के लिए हिमालय द्वारा की जा रही पर्यावरणीय सेवाओं पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस ओर किसी ने नहीं सोचा।

बातें तो हुईं किन्तु जमीन पर कुछ उतर नहीं सका। इसी का नतीजा है की हिमालय में मनमानी उखाड़-पछाड़ विकास के लिए की गई। कमोबेश यह अब तक जारी है और कमेटियों या हिमालयी विकास को दिशा देने के लिए बनाए गए ग्रुपों की संस्तुतियां धूल फांक रही हैं। विडंबना यह है कि जो लोग हिमालय के साथ मनमानी छेड़छाड़ का विरोध करते हैं उनको विकास विरोधी ठहरा कर चुप करवाने के प्रयास होते रहते हैं। मामला एक जोशीमठ का नहीं है। 

हिमालय में जहां भी अंधाधुंध विकास का मॉडल लागू किया गया है वहां कमोबेश इसी तरह की समस्याएं सामने आई हैं। किन्तु उनको लीपापोती वाली भाषा से टालने का काम ही किया गया है। समाधान तलाशने की ओर देखा नहीं गया है। हिमालयवासी स्वयं भी इस मामले में ज्यादा जागरूक नहीं रहे हैं। विकास के अंधे पैरोकारों के दबदबे ने विरोध के स्वरों को दबा दिया। हालांकि पर्यावरणीय दृष्टि से कुछ सावधानियां प्रयोग करने के लिए भी छोटे-मोटे प्रावधान हुए हैं। मगर उनक लागू करने की व्यवस्था बेहद लचर रही। इसलिए प्रोजेक्ट लागू करने वालों को अंधी छूट मिलती रही। और प्रावधनों के मायने जमींदोज हो गए।

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन जनसुनवाई कभी भी लोगों को जागरूक करके नहीं होती है बल्कि कोशिश की जाति है कि लोगों को कम से कम पता लगे ताकि योजना निर्माता अपने समर्थकों को एकत्र करके योजना के हक की बातों को आगे लाकर अपना रास्ता साफ कर सकें। प्रभाव आकलन का काम परियोजना निर्माताओं द्वारा तैयार रिपोर्ट के आधार पर ही किया जाता है। जाहिर तौर पर निर्माता परियोजना से खतरों को कम करके दिखाता है। परियोजना प्रभाव आकलन रिपोर्ट स्वतंत्र एजेंसी से बनवानी चाहिए। 

मौके पर निर्माण कार्य कैसे चल रहा है, कोई नहीं देखता। यहां तक कि निर्माण कार्यों में निकलने वाले मलबे की डम्पिंग करने के प्रावधानों का खुला उलंघन होता है किन्तु कोई नहीं सुनता। हिमालय में बन रही सडकों या विद्युत् परियोजनाओं में ऐसी घटनाएं हर कहीं सामान्य बात बन गई हैं। निर्माण स्थलों पर वनों की स्वीकृत से कई गुणा ज्यादा तबाही की जाती है किन्तु कोई नहीं देखता। कुछ प्रोजेक्ट्स पर जुर्माने भी लगे हैं। फिर भी मनमानी कहां रुकती है। गढ़वाल के चंबा से भी कुछ मकान धंसने की सूचनाएं आ रही हैं, उत्तराखंड में और भी कई इलाके खासकर बिजली प्रोजेक्ट्स और बड़ी खुली फोरलेन सड़कों के कारण खतरे में आ रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश भी ऐसी त्रासदी से अछूता नहीं है। प्रदेश में 450 के करीब जल विद्युत् परियोजनाएं बन चुकी हैं। इनसे 12000 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। सरकार की 27000 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना है। इन परियोजनाओं से जगह-जगह बस्तियों को खतरा पैदा हुआ है।

नाथपा झाकड़ी परियोजना की सुरंग के ऊपर बसे नाथपा, कंडार और निगुल्सेरी गांव धसने लगे हैं। किन्नौर से गुजर रहे राष्ट्रीय राजमार्ग पर करछम वांगतू प्रोजेक्ट सुरंगें गुजरने के कारण उर्नी ढांक में एक स्थाई भूस्खलन बन गया है। जंगी-ठोपन परियोजना का कार्य अभी चल रहा है, जिससे जंगी,रारंग, अक्पा और खदरा गांव को खतरा पैदा हो गया है। भरमौर में बन रही होली- बजोली परियोजना की टनल में दरार आने से झ्न्दौता गांव को भारी नुकसान हुआ है। जमीन धंस रही है कई मकानों में दरारें आ गई हैं। हिमाचल प्रदेश में चार फोरलेन सडकें बन रही हैं। उनके निर्माण से भी नुकसान हो रहा है जिसका कोई जायजा नहीं लिया जा रहा है।

 तात्पर्य यह है कि हिमालय में बड़े पैमाने के निर्माण कार्य बहुत सावधानी से किये जाने चाहिए और इसके लिए पर्वतीय विकास का अलग मॉडल विकसित किया जाना चाहिए जिसके लिए हिमालयी क्षेत्रों से लंबे समय से आवाजें उ रही हैं।

हिमालय में करणीय और अकरणीय गतिविधियों की सूची बननी चाहिए और निर्माण कार्यों एवं उद्योग स्थापना, खनन आदि कार्यों में उसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। हिमालयी राज्यों की सरकारें केंद्र सरकार पर दबाव डाल कर पर्वतीय विकास के लिए अलग विकास मॉडल बनवाने का प्रयास करें और केंद्र सरकार एसजेड कासिम की अध्यक्षता वाली कमेटी की रपट का अध्ययन करके इस काम में नीति आयोग की हिमालयी क्षेत्रीय परिषद को इस काम पर लगाए। विश्वव्यापी अनुभवों के आधार पर पर्वतीय विकास का पर्यावरण मित्र मॉडल विकसित किया जाए। इससे ही विकास की अंधी दौड़ में होने वाले स्थाई नुकसानों से बचा जा सकता है। साथ ही टिकाऊ विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। (लेखक, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों के विश्लेषक और पर्यावरणविद् हैं।)

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