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अब आसान होगी डिजिटल रुपये की राह...

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एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत 1 नवंबर को उन 50 देशों के समूह में शामिल हो गया जो डिजिटल मुद्रा की संभावनाएं तलाशने के अहम चरण में हैं यानी उन्होंने ऐसी मुद्रा की शुरूआत कर दी है, वहीं कुछ इसे तैयार की प्रक्रिया में हैं या ये देश प्रायोगिक परियोजनाएं शुरू करने के लिए तैयार हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सरकारी बॉन्ड में द्वितीयक बाजार कारोबार की थोक श्रेणी के लिए केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी), या ई-रुपया की पहली प्रायोगिक परियोजना शुरू की। पहले दिन 9 बैंक, सीबीडीसी का इस्तेमाल कर द्वितीयक बाजार में 275 करोड़ रुपये के बॉन्ड की खरीदारी करने और बेचने में शामिल थे। उस दिन कुल 20,865 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ। वास्तव में कारोबार का एक छोटा सा हिस्सा ही डिजिटल मुद्रा के माध्यम से पूरा किया जा सका लेकिन यह बस एक शुरुआत थी। आरबीआई इसी महीने खुदरा ग्राहकों के लिए इस प्रायोगिक परीक्षण के साथ इसको आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक अमेरिकी थिंक टैंक, अटलांटिक काउंसिल के सीबीडीसी ट्रैकर के मुताबिक 95 प्रतिशत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का प्रतिनिधित्व करने वाले कम से कम 105 देश इस वक्त सीबीडीसी की संभावनाएं तलाश रहे हैं। करीब दो-ढाई वर्ष पहले ही मई 2020 तक (जब दुनिया भर में कोविड महामारी का आतंक फैला था) महज 35 देश ही इस पर विचार कर रहे थे। जमैका ने हाल में सीबीडीसी-जैम-डीईएक्स लॉन्च किया है। इसके साथ, कम से कम 10 देशों ने पूरी तरह से एक डिजिटल मुद्रा की शुरुआत कर दी है और चीन की प्रायोगिक परियोजना का विस्तार 2023 में दिखने की उम्मीद है। चीन ने डिजिटल युआन मुद्रा की अपनी पहली प्रायोगिक परियोजना के सफल होने का दावा किया है। मई 2021 की शुरुआत में पूर्वी चीन में शांघाई के नजदीक के शहर सुजो में खरीदारी के त्योहार ‘डबल फाइव’ में करीब 181,000 ग्राहकों के डिजिटल वॉलेट में 55 युआन मुफ्त दिए गए थे। उस वक्त से ही यह प्रायोगिक परियोजना के दायरे को बढ़ा रही है खासतौर पर खुदरा भुगतान के लिए। जी-7 अर्थव्यवस्थाओं में अमेरिका और ब्रिटेन पिछड़ रहे हैं जबकि जी-20 देशों में से 19 देश सीबीडीसी के लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं। 19 देशों में से दक्षिण कोरिया, जापान और रूस सहित 16 देशों ने पिछले छह महीने में इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। इस सूची में भारत भी शामिल है। भारत के केंद्रीय बैंक, आरबीआई की कम से कम दो आंतरिक समितियों ने सीबीडीसी पर काम किया है और हाल ही में एक अवधारणा नोट जारी किया गया है। भारत में सीबीडीसी का उपयोग खुदरा और थोक भुगतान दोनों के लिए किया जाएगा। थोक भुगतान के लिए सीबीडीसी का उपयोग आसान है क्योंकि सभी अंतरबैंक लेनदेन पहले से ही डिजिटल स्वरूप में हैं और नकदी का कोई इस्तेमाल नहीं है। जब कोई व्यक्ति विभिन्न तरह के सामान खरीदने के लिए सीबीडीसी का उपयोग करता है तब नकदी के पूरक बनने का मकसद हासिल कर लिया जाएगा। क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग और वॉलेट की तरह, सीबीडीसी भुगतान प्रणाली का हिस्सा होगा जो वॉलेट के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं के लिए भुगतान करने का एक और तरीका है। देश की वित्तीय प्रणाली में ऐसे कई वॉलेट काम कर रहे हैं। सीबीडीसी भी उनमें से ही एक होगा लेकिन इसमें कुछ अंतर होगा जैसे कि यह देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किए जाएंगे और इसका वितरण और प्रबंधन वाणिज्यिक बैंकों द्वारा किया जाएगा। आरबीआई केंद्रीय स्तर पर नियंत्रित डेटाबेस का पालन कर सकती है क्योंकि डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी भारत की इतने बड़े पैमाने की आबादी के लिए ही पूरी तरह सक्षम नहीं हो सकती है जिसमें सहमति के आधार पर साझा और सिंक्रोनाइज किए गए डिजिटल डेटा का विभिन्न जगहों पर प्रसार किया जाता है ऐसे में सवाल यह है कि क्या सीबीडीसी नकदीरहित प्रणाली शुरू करेगा? फिलहाल, भविष्य में इसकी कोई संभावना नहीं दिखती है। वास्तव में, इस वक्त दुनिया का कोई भी देश नकदीरहित (कैशलेस) नहीं है। हालांकि बैंकनोट जारी करने वाला यूरोप का पहला देश स्वीडन आज दुनिया के प्रमुख नकदीरहित समाज के तौर पर जाना जाता है और इसके 98 फीसदी से अधिक नागरिकों के पास डेबिट/ क्रेडिट कार्ड है। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि 2024 तक इसकी अर्थव्यवस्था से नकदी पूरी तरह खत्म की जा सकती है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक नॉर्वे के 98 प्रतिशत से अधिक नागरिकों के पास डेबिट/ क्रेडिट कार्ड है और यह स्वीडन को यूरोप के पहले नकदीरहित देश बनने के लिए कड़ी टक्कर दे सकता है। हॉलैंड की 91 प्रतिशत आबादी ने डिजिटल भुगतान और डेबिट कार्ड को अपनाया है। फिनलैंड वर्ष 2030 तक पूरी नकदीरहित देश बन सकता है क्योंकि इसकी आबादी लगभग 55 लाख है। यह कार्ड के उपयोग के मामले में आयरलैंड से ठीक पीछे है। इसके अलावा चीन, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया, नीदरलैंड और कनाडा भी नकदीरहित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर हैं। दुनिया के सबसे बड़े ई-कॉमर्स बाजार चीन की तुलना में दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था ज्यादा नकदीरहित है हालांकि यह बेहद छोटा देश हैं। नकदीरहित अर्थव्यवस्था का एक फायदा यह है कि केंद्रीय बैंकों की नोट छापने, इसका वितरण करने और गंदे नोटों की सफाई की लागत में कमी आयेगी। आखिर यह इतना अहम क्यों है? आइए इस बात पर गौर करते हैं कि आरबीआई नोटों की छपाई पर कितने पैसे खर्च करती है। भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण लिमिटेड से सूचना के अधिकार के माध्यम से मिले आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2022 में 10 रुपये के 1,000 रुपये के नोटों का बिक्री मूल्य 960 रुपये था जिससे 10 रुपये के एक नोट की लागत 96 पैसे हो गई। वहीं 20 रुपये के एक नोट की लागत सिर्फ 1 पैसा कम यानी 95 पैसे थी। 50 रुपये के एक नोट की लागत 1.13 रुपये थी जबकि 100 रुपये के नोट की लागत 1.77 रुपये, 200 रुपये के नोट की लागत 2.37 रुपये और 500 रुपये के नोट की लागत 2.29 रुपये है। वित्त वर्ष 2021 की तुलना में वित्त वर्ष 2022 में, 50 रुपये के नोट की कीमत में 23 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई (यह 92 पैसे से बढ़कर 1.13 रुपये हो गई), जबकि 20 रुपये के नोट की कीमत सिर्फ 1 पैसा थी। इस दौरान 500 रुपये के नोटों की छपाई लागत में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। कुल मिलाकर, आरबीआई ने वित्त वर्ष 2022 में नोटों की छपाई के लिए 4,984.8 करोड़ रुपये खर्च किए जो वित्त वर्ष 2021 ( 4,012.09 करोड़ रुपये) की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक है हालांकि इस दौरान नोटों की आपूर्ति कम थी। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2017 (नोटबंदी का वर्ष) में नये नोट छापने के लिए 7,965 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जो पिछले वर्ष के 3,421 करोड़ रुपये की तुलना में 133 प्रतिशत अधिक है। पिछले साल तक आरबीआई अकाउंटिंग के उद्देश्यों के लिए जुलाई-जून वित्तीय वर्ष के मुताबिक काम पर अमल कर रहा था। जिन कारकों ने आरबीआई को सीबीडीसी को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है, उनमें से एक क्रिप्टोकरेंसी को लेकर इसे गहरा एतराज है। इसके पीछे भी कई कारण बताए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, उन्हें स्लॉट में बांटा नहीं जा सकता है क्योंकि वे न तो एक सामान हैं, न कोई मुद्रा और न ही भुगतान प्रणाली का हिस्सा हैं। चूंकि वे केंद्रीय बैंकों द्वारा जारी नहीं किए जाते हैं इसलिए ऐसी मुद्राओं को समर्थन नहीं दिया गया है। इसके अलावा, चूंकि लेनदेन अनाम तरीके से होता है इसलिए क्रिप्टोकरेंसी को सार्वजनिक जांच के दायरे में नहीं लाया जा सकता है। इसके केवाईसी मानदंडों के गंभीर असर होंगे और यह धनशोधन और आतंकी अभियानों की फंडिंग के जोखिमों से भरा है। आरबीआई क्रिप्टोकरेंसी को एक परिसंपत्ति के रूप में वगीर्कृत करने से इनकार करता है क्योंकि इसमें भविष्य में नकदी प्रवाह की गुंजाइश नहीं है और अटकलों के कारण इसके मूल्य में हमेशा उतार-चढ़ाव होता रहता है। इसमें उपभोक्ता सुरक्षा का भी पहलू नहीं है। सीबीडीसी बाहर से देश में भेजी हुई रकम की लागत भी कम करेगा क्योंकि सीमा पार लेन-देन सस्ता हो जायेगा। विश्व बैंक के एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2021 में सबसे ज्यादा बाहर से भेजी हुई रकम मिली थी। जून 2022 तक, 9 सीमा-पार थोक सीबीडीसी प्रायोगिक परियोजनाएं और तीन खुदरा लेनदेन से जुड़ी परियोजनाएं थीं। रॉयटर्स की एक हाल के रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े सीबीडीसी प्रायोगिक परीक्षण की जब बात होती है तब चीन के डिजिटल युआन की बात जरूर शामिल होती है। 15 अगस्त और 23 सितंबर के बीच छह सप्ताह के एक प्रायोगिक परीक्षण एमब्रिज पर अमल किया गया और यह एक ऐसी परियोजना है जिसके तहत चीन, हांगकांग, थाईलैंड और संयुक्त अरब अमीरात के केंद्रीय बैंकों द्वारा जारी डिजिटल मुद्राओं में सीमा पार भुगतान किया जाता है। जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, सीबीडीसी के वैश्वीकरण के प्रयास केंद्र में होते हैं। लेकिन अटलांटिक काउंसिल ने चेतावनी दी है कि वित्तीय प्रणाली को निकट भविष्य में विभिन्न समूहों और देशों के बीच इसके संचालन में समस्या का सामना करना पड़ सकता है और विभिन्न सीबीडीसी मॉडल के प्रसार से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक की जरूरत पड़ेगी।
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