एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश में एक समय कूज मुनिस्वामी वीरप्पन का जबरदस्त खौफ था। घनी मूछों वाला वीरप्पन कई दशकों तक सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द बना रहा। हाथी दांत के लिए सैकड़ों हाथियों की जान लेने वाले और करोड़ों रुपये के चंदन की तस्करी करने वाले वीरप्पन ने तस्करी के अपने अभियानों को अंजाम देने के दौरान करीब डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों की जान ली और उनमें से आधे से ज्यादा पुलिसकर्मी थे। आज का दिन देश के कई राज्यों की पुलिस, सुरक्षा बलों और प्रशासन के लिए बड़ी राहत लेकर आया। 18 अक्टूबर 2004 को सुरक्षा बलों ने दस्यु सरगना और कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को एक मुठभेड़ में मौत के घाट उतार दिया। 18 जनवरी 1952 को वीरप्पन का जन्म हुआ था। उसके बारे में कहा जाता है कि उसने 17 साल की उम्र से ही शिकार करने लगा था, वो भी किसी और जानवरों का नहीं बल्कि हाथियों का। उसके बारे में कहा तो ये भी जाता है कि वह हाथियों के माथे के बीच में गोलियां मारता था। वीरप्पन यूं ही नहीं सुरक्षाबलों के चंगुल में आया। उसे मारने के लिए पुलिस, सुरक्षाबलों को दशकों तक मशक्कत करनी पड़ी। वीरप्पन ने दशकों तक चंदन लकड़ी और हाथी दांत की तस्करी की। उसके कारनामे के चर्च देश में ही बल्कि विदेश में भी हुआ करते थे।
कई राज्यों की पुलिस उसे 20 साल तक ढूंढती रही। उसे पकड़ने में करोड़ों रुपये खर्च हुए। वीरप्पन को मौत के घाट उतारने वाले अधिकारी का नाम के। विजय कुमार है। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि सरकार की तरफ से उन्हें आदेश मिला था कि वीरप्पन को जिंदा या मुर्दा पकड़ना है। जब वीरप्पन की आंख के इलाज के लिए जंगल से बाहर निकलने वाला था, तभी उसे एनकाउंटर में ढेर कर दिया गया। ये साल था 2004 और दिन 18 अक्टूबर।