झारखंड
लोहरदगा : श्रीमद्भागवत कथा के समापन पर उमड़ा जनसैलाब
ABN Bureau
•
11 Sep, 2022
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टीम एबीएन, लोहरदगा। श्रीमद्भागवत कथा के सातवें व अंतिम दिन पूज्या जया किशोरी जी को नृत्य मंडली ने नृत्य व पुष्प वर्षा के साथ कार्यक्रम स्थल व्यास मंच में लाया गया। उनके मंच पर आते ही भक्तों के जयकारों एवं तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल भक्तिमय हो गया। राज्यसभा सांसद धीरज प्रसाद साहू ने पूज्या जयाकिशोरी जी को पगड़ी पहनाकर एवं अंगवस्त्र प्रदान कर अभिनन्द किया। साहू परिवार ने ठाकुर जी की पूजा अर्चना एवं आरती किया। श्री वल्लभ विठ्ठल गिरधारी, यमुना जी की बलिहारी के साथ कथा प्रारम्भ की गई पूज्या जया किशोरी ने कथा वाचन करते हुए बतलायी की सुदामा के दरिद्रता से त्रस्त होकर पत्नी के आग्रह पर मथुरा पहुंचने का झांकी के साथ वर्णन किया गया। उन्होंने कहा कि मित्रता प्रेम स्वरूप बिना स्वार्थ के निभाई जाए तो वह रिश्ता बहुत लंबे समय तक चलता है। प्रेम को सबसे बड़ा बताकर उन्होंने अपने भजन अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो, के दर पे सुदामा गरीब आ गया है। भटकते भटकते ना जाने कहा से तुम्हारे महल के करीब आ गया है... भजन के गाते ही भक्तों का जनसैलाब जय श्रीकृष्ण राधे राधे की आवाज से गूंज उठा। द्वारकाधीश श्रीकृष्ण अपने मित्र के प्रेम में वशीभूत होकर चावल खाते हैं। उनके मित्र प्रेम को रुक्मिणी देखती रह गई। सबसे ऊंची प्रेम सगाई सुनाकर सभी को भावविभोर कर दिया। जरासंध वध कथा सुनते हुए बतलायी कि श्रीकृष्ण ने जरासंध का वध करने की योजना बनाई। योजना के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मण के वेष में जरासंध के पास पहुंच गए और उसे कुश्ती के लिए ललकारा। लेकिन जरासंध समझ गया कि ये ब्राह्मण नहीं हैं। तब श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया। कुछ सोचकर अंत में जरासंध ने भीम से कुश्ती लड़ने का निश्चय किया। अखाड़े में राजा जरासंध और भीम का युद्ध कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से 13 दिन तक लगातार चलता रहा। इन दिनों में भीम ने जरासंध को जंघा से उखाड़कर कई बार दो टुकड़े कर दिए लेकिन वे टुकड़े हर बार जुड़कर फिर से जीवित हो जाते और जरासंध फिर से युद्ध करने लगा। भीम लगभग थक ही गया था। 14वें दिन श्रीकृष्ण ने एक तिनके को बीच में से तोड़कर उसके दोनों भाग को विपरीत दिशा में फेंक दिया। भीम, श्रीकृष्ण का यह इशारा समझ गए और उन्होंने वहीं किया। उन्होंने जरासंध को दोफाड़ कर उसके एक फाड़ को दूसरे फाड़ की ओर तथा दूसरे फाड़ को पहले फाड़ की दिशा में फेंक दिया। इस तरह जरासंध का अंत हो गया, क्योंकि विपरीत दिशा में फेंके जाने से दोनों टुकड़े जुड़ नहीं पाये। स्यमन्तक मणि की कथा में सत्राजित नामक यादव भगवान सूर्य का परम भक्त था। भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर उसे स्यमन्तक मणि प्रदान की थी। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा, सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो। इससे यह बहुमूल्य वस्तु सुरक्षित हो जायेगी और तुम्हें यश भी मिलेगा। परन्तु सत्राजित् अहंकारी तथा धनलोलुप था। उसने भगवान श्री कृष्ण का प्रस्ताव ठुकरा दिया। एक दिन सत्राजित् का भाई प्रसेनजीत, उस मणि को अपने गले में धारण कर शिकार खेलने के लिए वन में गया। वहां एक सिंह ने प्रसेनजीत को मार डाला और मणि को छीन लिया। उसके बाद ऋक्षराज जाम्बवान ने सिंह को मारकर वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चों को खेलने के लिए दे दी।अपने भाई प्रसेनजित के न लौटने पर सत्राजित को बड़ा दुख हुआ। वह कहने लगा, बहुत संभव है कि श्रीकृष्ण ने ही मणि के लोभ में मेरे भाई को मार डाला हो क्योंकि वह मणि पहनकर वन में शिकार खेलने गया था। जब श्रीकृष्ण ने सुना कि सत्राजित् मुझे ही कलंक लगा रहा है तब वह उसे धो डालने के उद्देश्य से प्रसेनजित को ढूंढते हुए ऋक्षराज जाम्बवान की भयंकर गुफा में प्रवेश किया। वहां उन्होंने देखा कि श्रेष्ठ स्यमन्तक मणि को बच्चों का खिलौना बना दिया है। भगवान श्रीकृष्ण जैसे ही मणि लेने के लिए आगे बढ़े, अचानक क्रोधित होकर जाम्बवान सामने आ गए। उस समय उन्हें भगवान की महिमा और प्रभाव का ज्ञान नहीं था इसलिए वे भगवान श्रीकृष्ण से घमासान युद्ध करने लगे। पूरे अट्इठास दिनों तक युद्ध चलता रहा। जाम्बवान् का शरीर पसीने से लथपथ हो गया। उत्साह जाता रहा। अंत में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को पहचान लिया और कहा प्रभु मैं जान गया कि आप ही पुराण पुरुष भगवान विष्णु हैं। मुझे पराजित करने की क्षमता किसी साधारण मनुष्य में नहीं हो सकती। आप विश्व के रचयिता ब्रह्मा आदि को भी बनाने वाले हैं। अज्ञानवश हुए मेरे अपराध को आप क्षमा करें। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ऋक्षराज हम मणि के लिए ही तुम्हारी इस गुफा में आए हैं। इस मणि से मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूं। भगवान के ऐसा कहने पर जाम्बवान ने बड़े आनंद से उनकी पूजा की तथा अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण अपनी नववधू जाम्बवती के साथ द्वारका लौट आये और मणि सत्राजित् को लौटा कर अपने ऊपर लगा कलंक मिटा दिया।
भागवत कथा सुनाते हुए राजा परीक्षित की कथा सुनाया गया, जिसमें शुकदेव को छह दिन बीत गए और उनकी मृत्यु में बस एक दिन शेष रह गया। लेकिन राजा का शोक और मृत्यु का भय कम नहीं हुआ। तब शुकदेवजी ने राजा को एक कथा सुनाई एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया और रास्ता भटक गया। रात होने पर वह आसरा ढूंढ़ने लगा। उसे एक झोपड़ी दिखी जिसमें एक बीमार बहेलिया रहता था। उसने झोपड़ी में ही एक ओर मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था और अपने खाने का सामान झोपड़ी की छत पर टांग रखा था। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका, पर कोई और आश्रय न देख उसने बहेलिए से झोपड़ी में रातभर ठहरा लेने की प्रार्थना की बहेलिया बोला, मैं राहगीरों को अकसर ठहराता रहा हूं। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे झोपड़ी छोड़ना ही नहीं चाहते। इसलिए आपको नहीं ठहरा सकता। राजा ने उसे वचन दिया कि वह ऐसा नहीं करेगा। सुबह उठते-उठते उस झोपड़ी की गंध में राजा ऐसा रच-बस गया कि वहीं रहने की बात सोचने लगा। इसपर उसकी बहेलिए से कलह भी हुई। वह झोपड़ी छोड़ने में भारी कष्ट और शोक का अनुभव करने लगा। कथा सुनाकर शुकदेव ने परीक्षित से पूछा क्या उस राजा के लिए यह झंझट उचित था? परीक्षित ने कहा वह तो बड़ा मूर्ख था, जो अपना राज-काज भूलकर दिए हुए वचन को तोड़ना चाहता था। वह राजा कौन था? तब शुकदेव ने कहा परीक्षित वह तुम स्वयं हो। इस मल-मूत्र की कोठरी देह में तुम्हारी आत्मा की अवधि पूरी हो गई। अब इसे दूसरे लोक जाना है। पर तुम झंझट फैला रहे हो। क्या यह उचित है? यह सुनकर परीक्षित ने मृत्यु के भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की तैयारी कर ली और अंतिम दिन का कथा श्रवण पूरे मन से किया और मोक्ष को प्राप्त किया। अंत में महाआरती के साथ दिनों का श्रीमद् भागवत कथा संपन्न हुआ। श्रीमद्भागवत कथा कार्यक्रम में रांची के विधायक सीपी सिंह स्थानीय साहू परिवार से शैफाली साहू, अरुणा साहू, उदय शंकर प्रसाद, धीरज प्रसाद साहू, सरिता साहू, मनु साहू, संजय साहू, सबिता साहु, राहुल साहू, वंदना साहू, दुर्गेश साहु, हर्षित साहू, रुचि साहू, राजश्री साहू, हंसा साहू, सौरभ साहु, शेरी मुनी साहू, मिली साहु, रितेश साहू, नवीन गुप्ता, दिनेश साहू, मदन मोहन शर्मा, सचिदा चौधरी, हजारीबाग से जयशंकर पाठक, डाल्टेनगंज से ज्ञान शंकर, ओमप्रकाश सिंह, अशोक यादव, संजय बर्मन, निशिथ जायसवाल, सुखैर भगत, राजेन्द्र खत्री, संदीप कुमार, लाल मोहन प्रसाद केशरी, कमल प्रसाद केशरी, मोहन दुबे, कंवलजीत सिंह, अरुण राम, राहुल कुमार, बलवीर देव, देवाशीष कार, ज्ञानचंद अग्रवाल , कृष्ण मोहन केशरी, कैलाश केशरी, उर्मिला केशरी, प्रमोद अग्रवाल, विजय जायसवाल, सतीश जयसवाल, राकेश सिंह, अजय पंकज, जगदीप भगत, कमला देवी, राजेश महतो, रजनी केशरी, जया साहू, गरिमा साहू, निधि गुप्ता, यशोदा देवी, गोपाल साहू, बिजली महतो, विनोद कुमार, राजू महतो, ब्रज सिंह, राजकुमार प्रसाद, मनीष साहू, अनुज साहू, जगदीप भगत, देवाशीष कर, कृपाशंकर सिंह, विनोद राय, गोपाल शरण मिश्र, पूनम बर्म्मन, गोवर्धन शर्मा, राजेश शर्मा, संजीव शर्मा, गीता देवी, जयगोविंद सोनी, इंदु देवी, विमल गुप्ता, सोहन पटेल, सुरेश ठाकुर, अनुज साहू, विनय पोद्दार, मुरली अग्रवाल, अनिल मोदी, संजय मोदी, प्रेम प्रजापति, रमेश केशरी, रमेश साहू, राजीव रंजन प्रसाद, उदय गुप्ता, विनोद सिंह, आशीष कुमार, अमित कुमार, आकाश खत्री, जयजीत चौबे, आलोक राय, दिवेश कुमार, नितिन सिंह, रोहित ओझा, नीरज साहू, निलेश सिंह, सुधीर अग्रवाल, संजय महाराज, प्रमोद अग्रवाल, विजय अग्रवाल, धर्मेंद्र कुमार, विजय जयसवाल, दिनेश पांडेय, शशि वर्मा, अविनाश कौर, लखन मांझी, प्रेम कुमार, गोपाल साहू, दुर्गा प्रजापति, सतीश विश्वकर्मा, मृत्युंजय मधुप, रोहन श्याम केसरी, बंटू जयसवाल, प्रदीप विश्वकर्मा, दिग्गज कुमार सिंह, सतीश विश्वकर्मा, आलोक कुमार, मनीष कुमार, सुजीत राय, रमेश साहु, राम लखन प्रसाद, प्रवीण कुमार, संदीप मिश्रा, सरोज प्रजापति, दिनेश अग्रवाल, मनीष प्रसाद, विजय सिंह, पंकज जयसवाल, हिमांशु कुमार, निखिल गर्ग, जयप्रकाश शर्मा, संजीव शर्मा, रमेश शर्मा, सागर वर्मा, मुरारी गोस्वामी, प्रवीण प्रसाद, गुडूस गुप्ता, गुप्तेश्वर गुप्ता, मनोज जयसवाल, मनोज गुप्ता, सत्यपाल कुमार, श्रवण कुमार, भीम महतो, नवीन जयसवाल, पिंटू साहू, दीपक महतो, आसुतोष कुमार सहित शहर के भक्तजन उपस्थित थे।
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टीम एबीएन, लोहरदगा। श्रीमद्भागवत कथा के सातवें व अंतिम दिन पूज्या जया किशोरी जी को नृत्य मंडली ने नृत्य व पुष्प वर्षा के साथ कार्यक्रम स्थल व्यास मंच में लाया गया। उनके मंच पर आते ही भक्तों के जयकारों एवं तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल भक्तिमय हो गया। राज्यसभा सांसद धीरज प्रसाद साहू ने पूज्या जयाकिशोरी जी को पगड़ी पहनाकर एवं अंगवस्त्र प्रदान कर अभिनन्द किया। साहू परिवार ने ठाकुर जी की पूजा अर्चना एवं आरती किया। श्री वल्लभ विठ्ठल गिरधारी, यमुना जी की बलिहारी के साथ कथा प्रारम्भ की गई पूज्या जया किशोरी ने कथा वाचन करते हुए बतलायी की सुदामा के दरिद्रता से त्रस्त होकर पत्नी के आग्रह पर मथुरा पहुंचने का झांकी के साथ वर्णन किया गया। उन्होंने कहा कि मित्रता प्रेम स्वरूप बिना स्वार्थ के निभाई जाए तो वह रिश्ता बहुत लंबे समय तक चलता है। प्रेम को सबसे बड़ा बताकर उन्होंने अपने भजन अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो, के दर पे सुदामा गरीब आ गया है। भटकते भटकते ना जाने कहा से तुम्हारे महल के करीब आ गया है... भजन के गाते ही भक्तों का जनसैलाब जय श्रीकृष्ण राधे राधे की आवाज से गूंज उठा। द्वारकाधीश श्रीकृष्ण अपने मित्र के प्रेम में वशीभूत होकर चावल खाते हैं। उनके मित्र प्रेम को रुक्मिणी देखती रह गई। सबसे ऊंची प्रेम सगाई सुनाकर सभी को भावविभोर कर दिया। जरासंध वध कथा सुनते हुए बतलायी कि श्रीकृष्ण ने जरासंध का वध करने की योजना बनाई। योजना के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मण के वेष में जरासंध के पास पहुंच गए और उसे कुश्ती के लिए ललकारा। लेकिन जरासंध समझ गया कि ये ब्राह्मण नहीं हैं। तब श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया। कुछ सोचकर अंत में जरासंध ने भीम से कुश्ती लड़ने का निश्चय किया। अखाड़े में राजा जरासंध और भीम का युद्ध कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से 13 दिन तक लगातार चलता रहा। इन दिनों में भीम ने जरासंध को जंघा से उखाड़कर कई बार दो टुकड़े कर दिए लेकिन वे टुकड़े हर बार जुड़कर फिर से जीवित हो जाते और जरासंध फिर से युद्ध करने लगा। भीम लगभग थक ही गया था। 14वें दिन श्रीकृष्ण ने एक तिनके को बीच में से तोड़कर उसके दोनों भाग को विपरीत दिशा में फेंक दिया। भीम, श्रीकृष्ण का यह इशारा समझ गए और उन्होंने वहीं किया। उन्होंने जरासंध को दोफाड़ कर उसके एक फाड़ को दूसरे फाड़ की ओर तथा दूसरे फाड़ को पहले फाड़ की दिशा में फेंक दिया। इस तरह जरासंध का अंत हो गया, क्योंकि विपरीत दिशा में फेंके जाने से दोनों टुकड़े जुड़ नहीं पाये। स्यमन्तक मणि की कथा में सत्राजित नामक यादव भगवान सूर्य का परम भक्त था। भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर उसे स्यमन्तक मणि प्रदान की थी। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा, सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो। इससे यह बहुमूल्य वस्तु सुरक्षित हो जायेगी और तुम्हें यश भी मिलेगा। परन्तु सत्राजित् अहंकारी तथा धनलोलुप था। उसने भगवान श्री कृष्ण का प्रस्ताव ठुकरा दिया। एक दिन सत्राजित् का भाई प्रसेनजीत, उस मणि को अपने गले में धारण कर शिकार खेलने के लिए वन में गया। वहां एक सिंह ने प्रसेनजीत को मार डाला और मणि को छीन लिया। उसके बाद ऋक्षराज जाम्बवान ने सिंह को मारकर वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चों को खेलने के लिए दे दी।अपने भाई प्रसेनजित के न लौटने पर सत्राजित को बड़ा दुख हुआ। वह कहने लगा, बहुत संभव है कि श्रीकृष्ण ने ही मणि के लोभ में मेरे भाई को मार डाला हो क्योंकि वह मणि पहनकर वन में शिकार खेलने गया था। जब श्रीकृष्ण ने सुना कि सत्राजित् मुझे ही कलंक लगा रहा है तब वह उसे धो डालने के उद्देश्य से प्रसेनजित को ढूंढते हुए ऋक्षराज जाम्बवान की भयंकर गुफा में प्रवेश किया। वहां उन्होंने देखा कि श्रेष्ठ स्यमन्तक मणि को बच्चों का खिलौना बना दिया है। भगवान श्रीकृष्ण जैसे ही मणि लेने के लिए आगे बढ़े, अचानक क्रोधित होकर जाम्बवान सामने आ गए। उस समय उन्हें भगवान की महिमा और प्रभाव का ज्ञान नहीं था इसलिए वे भगवान श्रीकृष्ण से घमासान युद्ध करने लगे। पूरे अट्इठास दिनों तक युद्ध चलता रहा। जाम्बवान् का शरीर पसीने से लथपथ हो गया। उत्साह जाता रहा। अंत में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को पहचान लिया और कहा प्रभु मैं जान गया कि आप ही पुराण पुरुष भगवान विष्णु हैं। मुझे पराजित करने की क्षमता किसी साधारण मनुष्य में नहीं हो सकती। आप विश्व के रचयिता ब्रह्मा आदि को भी बनाने वाले हैं। अज्ञानवश हुए मेरे अपराध को आप क्षमा करें। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ऋक्षराज हम मणि के लिए ही तुम्हारी इस गुफा में आए हैं। इस मणि से मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूं। भगवान के ऐसा कहने पर जाम्बवान ने बड़े आनंद से उनकी पूजा की तथा अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण अपनी नववधू जाम्बवती के साथ द्वारका लौट आये और मणि सत्राजित् को लौटा कर अपने ऊपर लगा कलंक मिटा दिया।
भागवत कथा सुनाते हुए राजा परीक्षित की कथा सुनाया गया, जिसमें शुकदेव को छह दिन बीत गए और उनकी मृत्यु में बस एक दिन शेष रह गया। लेकिन राजा का शोक और मृत्यु का भय कम नहीं हुआ। तब शुकदेवजी ने राजा को एक कथा सुनाई एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया और रास्ता भटक गया। रात होने पर वह आसरा ढूंढ़ने लगा। उसे एक झोपड़ी दिखी जिसमें एक बीमार बहेलिया रहता था। उसने झोपड़ी में ही एक ओर मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था और अपने खाने का सामान झोपड़ी की छत पर टांग रखा था। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका, पर कोई और आश्रय न देख उसने बहेलिए से झोपड़ी में रातभर ठहरा लेने की प्रार्थना की बहेलिया बोला, मैं राहगीरों को अकसर ठहराता रहा हूं। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे झोपड़ी छोड़ना ही नहीं चाहते। इसलिए आपको नहीं ठहरा सकता। राजा ने उसे वचन दिया कि वह ऐसा नहीं करेगा। सुबह उठते-उठते उस झोपड़ी की गंध में राजा ऐसा रच-बस गया कि वहीं रहने की बात सोचने लगा। इसपर उसकी बहेलिए से कलह भी हुई। वह झोपड़ी छोड़ने में भारी कष्ट और शोक का अनुभव करने लगा। कथा सुनाकर शुकदेव ने परीक्षित से पूछा क्या उस राजा के लिए यह झंझट उचित था? परीक्षित ने कहा वह तो बड़ा मूर्ख था, जो अपना राज-काज भूलकर दिए हुए वचन को तोड़ना चाहता था। वह राजा कौन था? तब शुकदेव ने कहा परीक्षित वह तुम स्वयं हो। इस मल-मूत्र की कोठरी देह में तुम्हारी आत्मा की अवधि पूरी हो गई। अब इसे दूसरे लोक जाना है। पर तुम झंझट फैला रहे हो। क्या यह उचित है? यह सुनकर परीक्षित ने मृत्यु के भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की तैयारी कर ली और अंतिम दिन का कथा श्रवण पूरे मन से किया और मोक्ष को प्राप्त किया। अंत में महाआरती के साथ दिनों का श्रीमद् भागवत कथा संपन्न हुआ। श्रीमद्भागवत कथा कार्यक्रम में रांची के विधायक सीपी सिंह स्थानीय साहू परिवार से शैफाली साहू, अरुणा साहू, उदय शंकर प्रसाद, धीरज प्रसाद साहू, सरिता साहू, मनु साहू, संजय साहू, सबिता साहु, राहुल साहू, वंदना साहू, दुर्गेश साहु, हर्षित साहू, रुचि साहू, राजश्री साहू, हंसा साहू, सौरभ साहु, शेरी मुनी साहू, मिली साहु, रितेश साहू, नवीन गुप्ता, दिनेश साहू, मदन मोहन शर्मा, सचिदा चौधरी, हजारीबाग से जयशंकर पाठक, डाल्टेनगंज से ज्ञान शंकर, ओमप्रकाश सिंह, अशोक यादव, संजय बर्मन, निशिथ जायसवाल, सुखैर भगत, राजेन्द्र खत्री, संदीप कुमार, लाल मोहन प्रसाद केशरी, कमल प्रसाद केशरी, मोहन दुबे, कंवलजीत सिंह, अरुण राम, राहुल कुमार, बलवीर देव, देवाशीष कार, ज्ञानचंद अग्रवाल , कृष्ण मोहन केशरी, कैलाश केशरी, उर्मिला केशरी, प्रमोद अग्रवाल, विजय जायसवाल, सतीश जयसवाल, राकेश सिंह, अजय पंकज, जगदीप भगत, कमला देवी, राजेश महतो, रजनी केशरी, जया साहू, गरिमा साहू, निधि गुप्ता, यशोदा देवी, गोपाल साहू, बिजली महतो, विनोद कुमार, राजू महतो, ब्रज सिंह, राजकुमार प्रसाद, मनीष साहू, अनुज साहू, जगदीप भगत, देवाशीष कर, कृपाशंकर सिंह, विनोद राय, गोपाल शरण मिश्र, पूनम बर्म्मन, गोवर्धन शर्मा, राजेश शर्मा, संजीव शर्मा, गीता देवी, जयगोविंद सोनी, इंदु देवी, विमल गुप्ता, सोहन पटेल, सुरेश ठाकुर, अनुज साहू, विनय पोद्दार, मुरली अग्रवाल, अनिल मोदी, संजय मोदी, प्रेम प्रजापति, रमेश केशरी, रमेश साहू, राजीव रंजन प्रसाद, उदय गुप्ता, विनोद सिंह, आशीष कुमार, अमित कुमार, आकाश खत्री, जयजीत चौबे, आलोक राय, दिवेश कुमार, नितिन सिंह, रोहित ओझा, नीरज साहू, निलेश सिंह, सुधीर अग्रवाल, संजय महाराज, प्रमोद अग्रवाल, विजय अग्रवाल, धर्मेंद्र कुमार, विजय जयसवाल, दिनेश पांडेय, शशि वर्मा, अविनाश कौर, लखन मांझी, प्रेम कुमार, गोपाल साहू, दुर्गा प्रजापति, सतीश विश्वकर्मा, मृत्युंजय मधुप, रोहन श्याम केसरी, बंटू जयसवाल, प्रदीप विश्वकर्मा, दिग्गज कुमार सिंह, सतीश विश्वकर्मा, आलोक कुमार, मनीष कुमार, सुजीत राय, रमेश साहु, राम लखन प्रसाद, प्रवीण कुमार, संदीप मिश्रा, सरोज प्रजापति, दिनेश अग्रवाल, मनीष प्रसाद, विजय सिंह, पंकज जयसवाल, हिमांशु कुमार, निखिल गर्ग, जयप्रकाश शर्मा, संजीव शर्मा, रमेश शर्मा, सागर वर्मा, मुरारी गोस्वामी, प्रवीण प्रसाद, गुडूस गुप्ता, गुप्तेश्वर गुप्ता, मनोज जयसवाल, मनोज गुप्ता, सत्यपाल कुमार, श्रवण कुमार, भीम महतो, नवीन जयसवाल, पिंटू साहू, दीपक महतो, आसुतोष कुमार सहित शहर के भक्तजन उपस्थित थे।
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