सौम्या भूषण
एबीएन कैरियर डेस्क। एक समय था जब रोजमर्रा की जिंदगी में हमें ऐसे लोगों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिन्हें हम जरूरी नहीं कि जानते भी हों। हम दुकानदार से किसी चीज के बारे में सलाह लेते थे, कतार में अपने पास खड़े व्यक्ति से बात कर लेते थे, किसी अनजान व्यक्ति से रास्ता पूछ लेते थे या किसी जरूरत की चीज के लिए पड़ोसी के घर चले जाते थे।
ये बातचीत सामान्य होती थीं और अक्सर कुछ ही देर बाद भुला दी जाती थीं। फिर भी, शायद अनजाने में यही छोटी-छोटी मुलाकातें हमारे भीतर समुदाय की भावना को मजबूत कर रही थीं। आज हम धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियों की आवश्यकता ही समाप्त करते जा रहे हैं, जिनमें हमें दूसरे लोगों से बातचीत करनी पड़े।
किराने का सामान घर तक पहुंच जाता है, भुगतान बिना किसी कैशियर के हो जाता है, नक्शे हमें रास्ता बता देते हैं, मनोरंजन हमारी निजी स्क्रीन तक सीमित हो गया है और लगभग हर जरूरत बिना घर से बाहर निकले पूरी की जा सकती है। मैं स्वयं इन सुविधाओं का उपयोग करती हूं और उनकी सराहना भी करती हूं।
वे समय बचाती हैं, सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाती हैं और उन्होंने रोजमर्रा की जिदगी को अविश्वसनीय रूप से अधिक कुशल बना दिया है। लेकिन शायद हमने असुविधा का अर्थ ही गलत समझ लिया है। कतार में खड़ा होना असुविधाजनक था, लेकिन उसी ने हमें कुछ मिनट दूसरे लोगों के साथ बिताने का अवसर दिया। स्थानीय बाजार किसी ऐप की तुलना में कम सुविधाजनक और कम कुशल था, लेकिन वह लोगों से मिलने की एक जगह भी था।
किसी से रास्ता पूछने में नक्शा खोलने की तुलना में अधिक समय लगता था, लेकिन उससे दो अनजान लोगों के बीच एक मानवीय जुड़ाव का क्षण पैदा होता था। इनमें से किसी भी गतिविधि का उद्देश्य आपसी बातचीत नहीं था। वह तो केवल उनका अनायास होने वाला परिणाम था।
जैसे-जैसे हम जिदगी को और तेज, आसान और अधिक आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, शायद हमें यह भी पूछना चाहिए कि क्या हम अपने समुदायों को कम परस्पर-निर्भर बना रहे हैं। प्रगति निश्चित रूप से हमें सुविधा देनी चाहिए, लेकिन वह हमें ऐसा समाज नहीं बना देनी चाहिए जहां हमें अपने आसपास के लोगों की शायद ही कभी जरूरत पड़े, हम उनसे मिलें या उन्हें महसूस तक करें।
शायद हमें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि हम कितनी असुविधाओं को समाप्त कर सकते हैं? बल्कि यह पूछना चाहिए कि कौन-सी असुविधाएं ऐसी हैं जिन्हें बनाये रखना हमारे लिए जरूरी है? आखिरकार, हम सामाजिक प्राणी हैं और किसी न किसी रूप में एक-दूसरे पर निर्भर हैं।