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नीतिश के जदयू के भीतर उठते सवाल और परीक्षा

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नीतिश के जदयू के भीतर उठते सवाल और परीक्षा
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डॉ अरविंद नाथ तिवारी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के सामने इन दिनों एक साथ कई राजनीतिक प्रश्न खड़े दिखाई दे रहे हैं। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र को लेकर पार्टी के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार और विधायक अनंत सिंह के बीच खुला टकराव, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर उठती चर्चाएं और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे पर अलग-अलग स्वर—इन सबने जदयू की आंतरिक राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। 

ये घटनाएं नेतृत्व, अनुशासन और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल पैदा कर रही हैं। पटना स्नातक सीट का विवाद फिलहाल सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक टकराव है। नीरज कुमार इस सीट से लगातार चौथी बार चुनाव लड़ रहे हैं। जदयू ने नीरज कुमार को फिर से प्रत्याशी बनाया है, जबकि अनंत सिंह ने सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ अभियान चलाने और उन्हें हराने की बात कही है, खुले तौर पर अनंत सिंह ने एक निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा की है। यह महज दो नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं है। 

दोनों नेताओं की मोकामा क्षेत्र की पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी इस विवाद को अतिरिक्त महत्व देती है। अनंत सिंह द्वारा नीरज कुमार पर लगाये गये पुराने आरोप और नीरज कुमार की ओर से अनंत सिंह के बयानों पर की गई टिप्पणियां राजनीतिक टकराव को और तीखा कर रही हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर आवश्यक है, इसलिए इन्हें राजनीतिक आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। 

इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पार्टी के भीतर अनुशासन का सवाल सार्वजनिक हो गया है। जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह ने पार्टी में आंतरिक मतभेद से इनकार करते हुए आंतरिक लोकतंत्र और बेहतर समन्वय की बात कह रहें हैं। दूसरी ओर, विवाद सार्वजनिक मंच पर जारी रहने से यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि पार्टी संगठन ऐसे मतभेदों को किस तरह सुलझाता है।

 इसी क्रम में कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा को लेकर भी राजनीतिक चचार्एं चलती रही हैं। उनके बारे में लगाए जा रहे आरोपों में यह दावा शामिल है कि वे नीतीश कुमार के आसपास निर्णय प्रक्रिया को अत्यधिक नियंत्रित कर रहें हैं। संजय झा ने इसके जवाब में पार्टी के एकजुट होकर नीतीश कुमार के नेतृत्व में काम करने की बात कही है। इसलिए यहां वास्तविक प्रश्न यह है कि पार्टी के भीतर संवाद और निर्णय प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। 

जदयू के लिए दूसरी परीक्षा गठबंधन की राजनीति से जुड़ी है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 2029 से पहले एनडीए शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कहे जाने के बाद जदयू ने इस विषय पर चर्चा की जरूरत बताई है। संजय झा ने अमित शाह से मिलने की बात कही, जबकि जदयू नेता श्याम रजक ने बिहार में यूसीसी लागू किए जाने का विरोध दोहराया।

इससे यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर जदयू और भाजपा के बीच दृष्टिकोण को लेकर सार्वजनिक विमर्श मौजूद है। दरअसल, चुनौती यहां नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत और जदयू के संगठनात्मक भविष्य की है। लंबे समय तक पार्टी की राजनीति का केंद्र नीतीश कुमार रहें हैं, अब पार्टी को यह साबित करना होगा कि नेतृत्व के इर्द-गिर्द बनी राजनीतिक संरचना को संगठनात्मक संस्थाओं, सामूहिक निर्णय और स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से कितनी मजबूती दी जा सकती है। 

पटना स्नातक चुनाव इस लिहाज से केवल एक विधान परिषद सीट का चुनाव नहीं रह गया है। इसके परिणाम से जदयू के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान की दिशा पर चर्चा तेज हो सकती है, लेकिन चुनाव परिणाम को पार्टी के पूरे राजनीतिक भविष्य का अकेला पैमाना मानना भी सही नहीं होगा। चुनाव में स्थानीय समीकरण, प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं के मुद्दे—सभी प्रभाव डालते हैं। 

जदयू के सामने इसलिए तीन स्तरों पर चुनौती है- संगठन के भीतर अनुशासन, नेतृत्व के बीच समन्वय और गठबंधन के भीतर अपनी राजनीतिक पहचान। यदि पार्टी इन तीनों स्तरों पर संवाद कायम रखती है तो मौजूदा मतभेद संगठनात्मक लोकतंत्र के दायरे में सुलझाये जा सकते हैं, यदि सार्वजनिक टकराव लगातार बढ़ता है और उसके समाधान के लिए प्रभावी राजनीतिक तंत्र दिखाई नहीं देता, तो उसका असर संगठन की एकजुटता पर पड़ सकता है। 

आज का यक्ष प्रश्न यह नहीं कि जदयू तत्काल दोफाड़ होगा या कौन नेता चुनाव जीतेगा। असली प्रश्न यह है कि बदलते राजनीतिक दौर में जदयू अपने मतभेदों को किस तरह संस्थागत संवाद में बदलता है। पटना स्नातक चुनाव एक तात्कालिक परीक्षा है, लेकिन जदयू के लिए असली परीक्षा उससे कहीं बड़ी—अपनी संगठनात्मक एकता, नेतृत्व की विश्वसनीयता और राजनीतिक पहचान को बनाये रखने की है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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