एबीएन न्यूज नेटवर्क, रांची। बड़े-बड़े पत्रकार और विद्वतजन चिंतित हैं। उनकी वाजिब चिंता मैथिली ठाकुर या किसी भी मासूम को लेकर हो सकती है। लेकिन आश्चर्य है कि जब 16 साल की उम्र में वंडरबॉय सचिन क्रिकेट खेलने के लिए मैदान में उतरे तो उस समय ऐसी बातें कहीं गई थी क्या?
क्या उन्हें यह कह कर नहीं रोका जा सकता था कि तुम्हारे सामने वसीम अकरम और उनके जैसे दुनिया के सबसे तेज गेंदबाज गेंदबाजी करने उतरेंगे। लेकिन देखिए उस वंडरबॉय को, उसने ऐसी कहानी लिख डाली कि आज आप उदाहरण देते हैं। दूसरी ओर उनके साथ ही विनोद कांबली भी थे, वह आज कहां हैं?
असल में मैंने जितना देखा और समझा है, उस हिसाब से किसी भी फील्ड में असफलता और सफलता में बस महीन फर्क होता है। आप मन को अनुशासन में रख कर ही तरक्की कर सकते हैं। आपकी सफलता आपके धैर्य, समर्पण और समझदारी पर निर्भर करती है।
जब हनुमान समंदर के किनारे खड़े होकर समुद्र पार करने की चिंता में डूबे हुए थे। पवनपुत्र, जो मेरे और आपके आराध्य हैं, भूल चुके थे कि उनमें असीम शक्ति है। वह उड़ सकते हैं। तब जामवंत देवदूत बनकर आए। उनकी शक्ति का अहसास कराया और लंका पर विजय हासिल हो सका।
अब आयरन लेडी इंदिरा गांधी की बात करें, तो उन्हें बापू, नेहरू जैसे लोगों का कम उम्र से सानिध्य मिला और वह एक कद्दावर व सफल राजनीतिज्ञ बनीं। ऐसे में देखें तो मैथिली को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आज के चाणक्य अमित शाह का साथ और संरक्षण मिल रहा है।
अब जब मैथिली के राजनीतिक जीवन का आगाज हो रहा है तो तमाम चिंतित लोगों को अपने अंदर मौजूद जामवंत को भी जगाना होगा। राजनीति को आप सही क्षेत्र नहीं मानते। लेकिन इसे सही बनाने के लिए जब कलाकारों, पत्रकारों और साहित्यकारों को लाया जाता है तो हजारों सवाल करते हैं। वैचारिक द्वंद्व की ऐसी दीवार खड़ी करते हैं कि शक्ति स्थिर हो जाती है।
जिस मिथिला में एक स्त्री से शंकराचार्य भी परास्त हो चुके हों और जो मां सीता की जन्मस्थली हो, वहां स्त्री शक्ति पर सवाल गैरवाजिब लगता है। ऐसा लगता है कि मिथिला के विचारों को जंग लग चुकी है। ऐसे में मन रूपी हनुमान को जगाने के लिए जामवंत बनना होगा। मिथिला या किसी भी क्षेत्र में नारी शक्ति या आधी आबादी ही परिवर्तन का अहसास करा सकती है। उसके लिए आपको और हमको खुद से सवाल करना होगा कि हम क्यों ऐसी बहस या बात करते हैं।
किसी के मासूम होने, किसी के संरक्षण में रहने जैसा तर्क देखकर आप बस मन को दिलासा दिलाते हैं। मैथिली हारे या जीते, इससे फर्क ज्यादा नहीं पड़ता है। लेकिन उनकी राजनीतिक पहल पर खड़े किए जा रहे सवालों ने खोखले हो रहे समाज की पोल खोल दी है। ऐसे में समाज के जामवंत सरीखे महापुरुषों को आगे आना होगा। तभी जीत भी मिलेगी और राम राज्य हासिल होगा।