एबीएन सोशल डेस्क। एक 15 साल की लड़की, जो अपने जीवन संवारने की उम्मीद लिए हर दिन एक नयी जंग लड़ रही थी। बहुत छोटी थी, तभी उसके माता-पिता उसे हमेशा के लिए छोड़कर इस दुनिया से चले गए। चुपचाप वह जीवन के घने अंधेरे में अकेले लड़ने के लिए मजबूर हो गयी। अनाथ होने के बावजूद उसकी आंखों में भविष्य के सपने थे—एक ऐसी उम्मीद, जो उसे अपनी पढ़ाई, मेहनत और अपने भविष्य में नजर आती थी।
उसकी दुनिया में सिर्फ एक ही चीज थी, जो उसे जीने का मकसद देती थी—शिक्षा। अपनी मौसी के घर पर रहते हुए उसने खुद से एक वादा किया था कि वह खुद ही अपनी तकदीर लिखेगी। ये सच्ची घटना है बिहार के मुंगेर जिले की पूजा (बदला हुआ नाम) की। उसका जीवन एक दर्द भरी कहानी से कम न था। लेकिन एक दिन, जब वह अपनी किताबों में खोई हुई थी, तभी उसे मालूम होता है कि उसकी शादी तय कर दी गई है।
यह खबर किसी बड़े तूफान की तरह उसके सपनों को बर्बाद कर देने वाली थी। एक अनाथ लड़की, जिसने कभी परिवार का प्यार नहीं देखा, अब अपने भविष्य को भी दांव पर देख रही थी। यह पल उसके लिए उस अंधेरे की तरह था, जो सब कुछ निगलने को तैयार था। शादी की तैयारियों में व्यस्त उसकी मौसी ने एक बार भी नहीं सोचा कि अभी तो पूजा की उम्र पढ़ाई करने की है, शादी की नहीं। उनकी एकमात्र चिंता यह थी कि उसकी शादी जल्द से जल्द करके अपने कर्तव्यों से मुक्त हो जायें।
इसी दौरान, पूजा की शादी की खबर स्वयंसेवी संगठन परिवार विकास चंद्रशेखर नगर के सदस्यों को मिली। उन्होंने बिना देर किये गांव में जाकर पूजा की उम्र के बारे में मालूम किया तो पता चला कि वह महज 15 साल की है, जो कि शादी के लिए बहुत छोटी थी। बता दें कि देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी संगठन है।
इस तरह प्रशासन और स्वयंसेवी संगठन की एक संयुक्त टीम ने पूजा के घर जाकर उसकी मौसी को बाल विवाह के कानूनी पहलुओं के बारे में समझाया। शुरू में वे इसे मानने को तैयार नहीं थीं, क्योंकि उन्हें इस बात का कोई ज्ञान नहीं था कि बाल विवाह करने पर सजा और जुमार्ना हो सकता है। जब टीम ने उन्हें कानूनी कार्रवाई, जेल की सजा और जुमार्ने के बारे में विस्तार से बताया, तब जाकर उनकी समझ में आया कि यह तो अपराध है।
अंतत:, उन्होंने शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए यह वादा किया कि पूजा की शादी बालिग होने के बाद ही करेंगे। इसी अज्ञानता के चलते बिहार में बाल विवाह की दर, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 5 (साल 2019-21) के मुताबिक 40.8% है, जो राष्ट्रीय दर (23.3%) से बहुत ज्यादा है। वहीं मुंगेर जिले की बात करें तो यहां 34.7 फीसदी लड़कियों का विवाह 18 साल के पहले कर दिया गया था। यानी जिले में हर तीसरी बच्ची का बाल विवाह हुआ।
स्वयंसेवी संगठन परिवार विकास चंद्रशेखर नगर के निदेशक भावानंद ने कहा, अभी भी कई सुदूर अंचल हैं, जहां समाज को बाल विवाह के कानूनी प्रावधानों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इन क्षेत्रों में जागरूकता ही सबसे मारक कदम है। उन्होंने कहा, हमारी पूरी कोशिश है कि पूजा को जल्दी ही राज्य सरकार की परवरिश योजना से जोड़ा जाए, ताकि उसकी आर्थिक समस्याओं का समाधान हो सके और वह बिना किसी बोझ के अपनी पढ़ाई जारी रख सके। आज पूजा फिर से हंसते-खेलते हुए, अपने सपनों को साकार करने के लिए स्कूल जा रही है, जो उसके जीवन में एक नयी शुरुआत है।