अयोध्या राम जन्मभूमि भूमि पूजन,भारत की आस्था, संस्कृति और स्वाभिमान का ऐतिहासिक क्षण : संजय सर्राफ

 

  • अयोध्या राम जन्मभूमि भूमि पूजन,भारत की आस्था, संस्कृति और स्वाभिमान का ऐतिहासिक क्षण : संजय सर्राफ

एबीएन सेंट्रल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद झारखंड सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि 5 अगस्त 2020 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।इसी दिन उत्तर प्रदेश के अयोध्या धाम में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन एवं शिलान्यास का ऐतिहासिक कार्यक्रम संपन्न हुआ। 

इस शुभ अवसर पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधिवत भूमि पूजन कर मंदिर निर्माण की आधारशिला रखी। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा अनेक संत-महात्मा एवं विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। अयोध्या को सनातन परंपरा में भगवान श्रीराम की जन्मस्थली माना जाता है।

सदियों से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था इस पावन स्थल से जुड़ी रही है। लंबे सामाजिक, धार्मिक और न्यायिक विमर्श के उपरांत 9 नवंबर 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राम जन्मभूमि विवाद पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, जिसके बाद मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके उपरांत श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया गया और मंदिर निर्माण की तैयारियाँ प्रारंभ हुईं।

भूमि पूजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय एकता का भी प्रतीक बन गया। देश-विदेश में बसे करोड़ों श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक क्षण का उत्सव दीप प्रज्वलित कर, पूजा-अर्चना तथा भजन-कीर्तन के माध्यम से मनाया। अनेक मंदिरों एवं घरों में दीपोत्सव जैसा वातावरण देखने को मिला। 

भूमि पूजन के साथ ही आरंभ हुआ भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण आज भारतीय स्थापत्य कला, शिल्प परंपरा और सांस्कृतिक गौरव का अनुपम उदाहरण बन चुका है। विशाल नागर शैली में निर्मित यह मंदिर श्रद्धा, विश्वास और भारतीय संस्कृति की भव्य अभिव्यक्ति है। इसके निर्माण में देशभर से प्राप्त जनसहयोग और समर्पण ने इसे राष्ट्रीय सहभागिता का अद्वितीय प्रतीक बना दिया। 

अयोध्या राम जन्मभूमि का भूमि पूजन भारतीय जनमानस की आस्था, धैर्य और सांस्कृतिक चेतना का ऐतिहासिक पर्व है। यह केवल मंदिर निर्माण की शुरुआत नहीं, बल्कि भारत की सनातन परंपरा, आध्यात्मिक मूल्यों और सांस्कृतिक आत्मगौरव के पुनर्जागरण का भी स्मरणीय अध्याय है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत पर गर्व करने की प्रेरणा देता रहेगा।

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