टीम एबीएन, रांची। आज दिनांक 6 अक्टूबर 2026 को इफको रांची के द्वारा रिफॉर्म उत्सव के तहत कृषक गोष्ठी का आयोजन अनगड़ा प्रखंड के गेतलसूद ग्राम में किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के तौर में झारखंड राज्य के राज्य विपणन प्रबंधक डॉ शशिभूषण समदर्शी ने भाग लिया। इफको झारखंड के कृषि अनुभाग से संबित पात्रा। इफको रांची के कनीय क्षेत्र प्रबंधक सुशील कुमार, एसएफए कुलदीप कुमार के अलावा 60 स्थानीय कृषक बंधुओं ने भाग लिया।
असंतुलित रसायनों के उपयोग से मिट्टी एवं पर्यावरण में हो रहे दुष्प्रभावों एवं उससे मानव शरीर में हो थी विकृतियों के बारे में विस्तार से बात किया गया। डॉ शशिभूषण समदर्शी ने किसानों एवं बिक्री केंद्र प्रभारियों को विकृत कृषि पद्धतियों से मिट्टी में जलवायु में हो रही क्षति के बारे में बताते हुए कहा कि असंतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग एवं कार्बनिक उर्वरकों के उपयोग की कमी के वजह से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ 0.5% से भी निचले स्तर में पहुंच गए हैं जिससे मिट्टी में उपयोगी सुक्ष्म जीव कम होते जा रहे हैं एवं किछुआ की भी खेत से खत्म होते जा रहे हैं।
वर्तमान परिवेश में ये बहुत महत्वपूर्ण है कि किसान बंधु धान की पराली को न जलायें एवं इफको द्वारा बनाये जाने वाले बायोडकंपोजर का उपयोग करके, पराली से कंपोस्ट बनायें और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ायें, जिससे मिट्टी को उर्वरक क्षमता बढ़ सके। उन्होंने मिट्टी को बचाने के लिए रासायनिक उर्वरकों की मात्रा को आधा करके नैनो उर्वरकों की उपयोग पर जोर दिया।
उसकी संपूर्ण विधि को बताते हुए उन्होंने पौधों में आवश्यक विभिन्न पोषक तत्वों की भूमिका को क्रमवार तरीके से समझाया और बताया कि पारंपरिक यूरिया की उपयोग दक्षता केवल 30-35% तथा पारंपरिक डीएपी की उपयोग दक्षता मात्र 15-20% होती है। इसके असंतुलित उपयोग से फसलों में कई प्रकार के पोषण विकार उत्पन्न होते हैं। श्री पात्रा ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि पारंपरिक यूरिया एवं डीएपी की मात्रा को आधा करके नैनो उर्वरकों का उपयोग करने से बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
इसके अंतर्गत 5-10 मिली नैनो डीएपी प्रति किलो बीज से बीज शोधन या 5 मिली नैनो डीएपी प्रति लीटर पानी से जड़ शोधन करने की सलाह दी गयी। साथ ही नैनो यूरिया प्लस एवं नैनो डीएपी को 4 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर धान में पहला छिड़काव 25-30 दिन तथा दूसरा छिड़काव 45-50 दिन पर करने से अच्छी उपज प्राप्त होने की जानकारी दी गयी।
सुशील कुमार ने किसानों को विभिन्न फसलों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपयोगिता के बारे में विस्तार से बताया। इसके अलावा उन्होंने धान में लगने वाली प्रमुख बीमारियों, उनके लक्षण और समाधान पर विस्तृत चर्चा की तथा इफको के अन्य उत्पादों जैसे नैनो जिंक, सागरिका, तरल कंसोर्टिया, जिंक सल्फेट मोनो और कैल्शियम नाइट्रेट की जानकारी भी दी।
नैनो जिंक के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि इसका डोज 1 मिली प्रति लीटर पानी है। इसके प्रयोग से धान में खैरा रोग नहीं होता, अधिक कल्ले निकलते हैं, पत्तियां चौड़ी होती हैं तथा दानों का भराव अच्छा होता है, जिससे उपज में वृद्धि होती है।
कंसोर्टिया के संबंध में उन्होंने बताया कि इसका उपयोग बीज उपचार, जड़ उपचार और मृदा उपचार के रूप में किया जा सकता है। यह जैविक खेती के लिए उपयुक्त है, जिससे रासायनिक खाद की खपत 15-20% तक कम होती है तथा उपज 10-20% तक बढ़ती है। साथ ही यह मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या को बढ़ाता है और खेती की लागत को कम करता है।