वन और पर्यावरण
पर्यावरण आंदोलनकर्मी का नेतृत्व और मार्गदर्शन स्वर्ग से भी करते रहेंगे सुंदरलाल बहुगुणा...
ABN Bureau
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10 Jan, 2022
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एबीएन डेस्क। पिछली जयंती तक पर्यावरण और पारिस्थितिकी विज्ञानकर्मियों और आंदोलनकारियों का मार्गदर्शन और नेतृत्व करने के लिए स्वयं सुंदरलाल बहुगुणा हमलोग के बीच मौजूद थे, लेकिन कोरोना के दूसरे कहर ने उनको हमसे छीन लिया। आज भौतिक रूप से वह हमारे बीच भले न हों, लेकिन दशकों का उनका अनुभव, ज्ञान, कर्मठता, निष्ठा, समर्पण हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा। वह पलामू भी आए थे, टाउन हॉल के सार्वजनिक आयोजन से उन्होंने पलामूवासियों को उपकृत और कृतार्थ भी किया था। उनकी सादगी, सहजता, सरलता ने मेरी हिम्मत बढ़ाई थी कि जब भी देहरादून जाऊं, उनके सान्निध्य में कुछ पल बिताऊं, उनका आशीर्वाद लूं। 6 मार्च 2020 को सुंदरलाल बहुगुणा के दर्शन करने हेतु मैं शास्त्री नगर, देहरादून स्थित उनके आवास पहुंचा था, वह अपने बेटी-दामाद के यहां रहते थे। मेरे साथ पत्नी शीला श्रीवास्तव और मेरा छोटा पुत्र परिमल परितोष था। 93वर्ष की उम्र में पत्नी विमला बहुगुणाकी तीमारदारी में वह लगे थे। पूछता हूं-कौन-सी बिमारी हैं? बताते हैं-बुढ़ापा अपने आप में सबसे बड़ी बिमारी है। लेकिन, सुंदरलाल बहुगुणा अपनी पीड़ा और दर्द छुपा नहीं पाते। कहने से नहीं चूके-हमारी पूर्व की पीढ़ी ने प्रकृतिका जो खूबसूरत स्वरूप विरासतमें हमें सौंपा था, उसे हमारी पीढ़ी सहेज,संवार कर नहीं रख सकी। जब आज हमारी पीढ़ी दुनिया को अलविदा कह रही है तो दिल में एक कसक तो है ही कि प्रकृति के साथ हमने अन्याय किया। अगली पीढ़ी को हम पहले जैसी खूबसूरत दुनिया सौंपकर नहीं जा रहे हैं। सुंदरलाल बहुगुणा को लोग पर्यावरण गांधी भी कहते हैं। उन्हें पद्मश्री(1981), जमनालाल बजाज पुरस्कार (1985), सरस्वती सम्मान(1987), गांधी सम्मान (1999) और पद्मविभूषण(2001) जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। लेकिन, समाज, राष्ट्र या विश्व उनकी पीड़ा और दर्द का निवारण नहीं करती तो ये सारे सम्मान ढकोसलेबाजी और खानापूर्ति दीखते हैं। (ध्यातव्य है कि 1981में एक तरफ सरकार उनको पद्मश्री से सम्मानित कर रही थी, दूसरी तरफ हिमालय में पेड़ों की कटाई भी जारी थी।यह सरकार का परस्पर विरोधाभासी रवैया था।सुंदरलाल बहुगुणा ने सरकार की इस विरोधाभासी रवैया के खिलाफ पद्मश्री सम्मान लेने से इन्कार कर दिया था।) आज दो वर्ष बाद भी कानों में उनकी आवाज गूंजती है, उनकी पीड़ा मुझे झकझोरती है-विरासत में जितनी खूबसूरत दुनिया हमारी पीढ़ी को मिली थी, उसे सहेज संवार कर हम नहीं रख सके। अपने सार्वजनिक संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी शिरकत से लेकर चिपको आन्दोलन और टिहरी बांध विरोधी आन्दोलन की छोटी से छोटी बात उन्हें याद थी।उनके पास संघर्ष-गाथा के अद्भुत संस्मरणों का जखीरा था।
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